आदिवासी गोंड़ समाज ने आदिवासी महाकवि कालिदास पंडो की 1675 वीं जयंती कार्यक्रम का किया आयोजन, राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ रामविजय शर्मा रहे मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद, डॉ शर्मा ने कहा- महाकवि कालिदास जी पंडो का है गौरवशाली इतिहास

रायपुर के बंजारी धाम में आयोजित जयंती कार्यक्रम
जयंती कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ रामविजय शर्मा

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आदिवासी गोंड़ समाज ने आदिवासी महाकवि कालिदास पंडो की 1675 वीं जयंती कार्यक्रम का किया आयोजन, राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ रामविजय शर्मा रहे मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

सक्ती- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बंजारी धाम में आदिवासी गोंड़ समाज ने विगत वर्षों की तरह इस वर्ष भी आदिवासी परंपरा के अनुसार आदिवासी महाकवि कालिदास पंडो की 1675 वीं जयंती मनायी। इस अवसर पर आदिवासी महाकवि कालिदास पंडो की प्रतिमा की पूजा अर्चना कर तथा प्रसाद वितरण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. राम विजय शर्मा इतिहासकार एवं पुरातत्व वेता रायपुर भारत ने आदिवासी महाकवि कालिदास पंडो की जीवनी तथा उनकी रचनाओ के बारे में विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने नें बताया की आदिवासी महाकवि कालिदास पंडो का जन्म 15 नवंबर 350 ईस्वी को मृगाडाँड़ में हुवा था। उनके पिता का नाम शिव दास पंडो तथा माता का नाम तारा देवी था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा मृगाडाँड़ में प्राप्त की तथा बाद में वाराणसी में 6 वर्षों तक संस्कृत का अध्ययन किया उस समय वाराणसी संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ रामविजय शर्मा ने कहा कि वाराणसी से लौटने के पश्चात मृगाडाँड़ के रामगढ़ पहाड़ी के एक गुफा में बैठकर ऋतुसंहार, मेघदूत तथा अभिज्ञानशाकुन्तलम कुल 3 ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों की रचना के पश्चात उनकी ख्याति देश विदेश में फैल गयी और उनकी ख्याति सुन कर चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य नें अपने राजदरबार में पाटलीपुत्र बुलाया तथा अपने दरबार के नवरत्नों में प्रथम स्थान दे कर सम्मानित किया। उनकी रचनाओं में प्रकृति पर जोर, मौखिक कहानियों, पौराणिक कथाओं तथा प्रतीकवाद पर जोर दिया गया है जो सर्वत्र दिखता है और ये सभी तत्व आदिवासी संस्कृति के मूल तत्व है। गुप्त राजदरबार में रहकर अन्य ग्रंथों की रचना की जिनपर राजसी प्रभाव परिलक्षित होता है अपने ग्रंथों में राजदरबार के कुटिल माहौल तथा चाटुकारिता का भी वर्णन किया है। बाद में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक राजा रुद्रसेन‌द्वितीय से विवाह किया तो कालिदास जी को साथ में उनके सलाह तथा मार्गदर्शन के लिए वाकाटको की राजधानी नागपूर भेज दिया गया । प्रभावती गुप्ता के दोनों पुत्रों दिवाकर सेन और दामोदर सेन की शिक्षा कालिदास द्वारा दी गयी। बाद में दामोदर सेन (प्रवर सेन द्वितीय) जब वाकाटक राजा बने तो कालिदास उनके दरबार की शोभा बढ़ाए तथा उन्हे मार्गदर्शन तथा सलाह दिया। प्रवर सेन द्वितीय ने “सेतु बंध” नामक प्राकृत ग्रंथ लिखा तो कालिदास जी ने ही उसे लिखवाया तथा संशोधित किया। प्रवर सेन द्वितीय का शासनकाल 420 ई. से 455 ई. तक था। इस अवसर पर समारोह की अध्यक्षता बंजारी के उपसरपंच थनवार ध्रुव ने किया, उन्होंने बताया कि हम सभी आदिवासी समाज महाकवि कालिदास पंडो के बताए मार्गों पर चलेंगे। उन्होंने आगे बताया कि कालिदास काली की पूजा करते थे। हर आदिवासी के घर में काली कंकाली की पूजा होती है तथा उनका स्थान रहता है। हमारे पूर्वज बताते थे कि कालिदास हमारे आदिवासी समाज के हैं। इस अवसर पर देव कुमार ध्रुव, घनश्याम ध्रुव, देवेन्द्र ध्रुव, तरुण ध्रुव सहित ग्रामीण जनता उपस्थित थे

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