पूरी दुनिया में प्रसिद्ध मैसूर का दशहरा- क्यों है यह खास.जानिए देश की प्रसिद्ध साहित्यकार उषा केडिया की कलम से. मां चामुंडेश्वरी की धरती है मैसूर. आज भी राजशाही परंपराओं का होता है निर्वहन

मैसूर का प्रसिद्ध दशहरा
समाजसेविका एवं साहित्यकार श्रीमती उषा जैन केडिया मैसूर कर्नाटक

पूरी दुनिया में प्रसिद्ध मैसूर का दशहराय क्यों है यह खास.जानिए उषा केडिया की कलम से

मैसूर कर्नाटक से हमारे संवाददाता की विशेष खबर

मैसूर- पूरी दुनिया में देखा जाये तो कर्नाटक राज्य के मैसूर का दशहरा अपने आप में एक अनूठा एवं प्रसिद्ध दशहरे के रूप में जाना जाता है।तथा यह दशहरा क्यों खास है इसके बारे में प्रसिद्ध समाजसेविका श्रीमती उषा जैन केडिया मैसूर ने अपने शब्दों के मध्यम से मैसूर के दशहरे पर प्रकाश डाला है

ख़ास है मैसूर का दशहरा

समाजसेवी का उषा केडिया रहती है कि जहाँ इतिहास जीवंत होता है, परंपराएँ मुस्कुराती हैं और संस्कृति अपने पूरे वैभव के साथ सजती है।चंदन की मनमोहक महक, मैसूर सिल्क की बेमिसाल कारीगरी, कावेरी नदी के तट पर स्थित विश्वप्रसिद्ध वृंदावन गार्डन, ऐतिहासिक राजमहलों की भव्यता और चारों ओर फैली हरियाली-इन सबका सम्मोहक संगम है मैसूर। कर्नाटक का यह ऐतिहासिक नगर केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी गौरवशाली विरासत, समृद्ध कला-संस्कृति और राजसी परंपराओं के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसे यूँ ही ‘राजाओं का शहर’ और ‘ग्रीन सिटी’ नहीं कहा जाता। यहाँ का प्रत्येक स्मारक, प्रत्येक गली और प्रत्येक ऐतिहासिक धरोहर अपने भीतर अतीत की अनगिनत कहानियाँ समेटे हुए है।लेकिन मैसूर की असली पहचान तब अपने पूरे वैभव के साथ सामने आती है, जब शारदीय नवरात्रि के साथ दशहरे का उत्सव आरंभ होता है। उस समय पूरा शहर मानो भक्ति, उल्लास और शाही ठाठ-बाट के रंगों में रंग जाता है। चारों ओर उत्सव की रौनक, मंदिरों में गूँजते भक्ति के स्वर और रोशनी से जगमगाते महल का दृश्य हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है।

आखिर क्या है मैसूर के दशहरे की खासियत

आखिर क्या है मैसूर के दशहरे की वह ख़ासियत, जो इसे देश के अन्य दशहरा उत्सवों से अलग पहचान देती है? आइए, इतिहास और परंपराओं की इसी अद्भुत यात्रा पर चलते हैं।

माँ चामुंडेश्वरी की धरती-मैसूर

मैसूर का इतिहास पौराणिक कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस नगर का नाम महिषासुर के नाम पर पड़ा। पौराणिक कथा के अनुसार, इसी क्षेत्र में माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया था। माँ चामुंडेश्वरी को इसी विजय का प्रतीक माना जाता है।मैसूर के निकट स्थित चामुंडी पहाड़ी पर माँ चामुंडेश्वरी का प्रसिद्ध मंदिर है। पहाड़ी पर विराजमान देवी माँ के दर्शन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। मंदिर तक पहुँचने का मार्ग, पहाड़ी से दिखाई देने वाले शहर के मनोरम दृश्य और वातावरण में व्याप्त आध्यात्मिक शांति श्रद्धालुओं को एक विशेष अनुभूति प्रदान करते हैं।नवरात्रि और दशहरे के दिनों में माँ चामुंडेश्वरी के प्रति श्रद्धा और भी गहरी दिखाई देती है। ऐसा लगता है मानो पूरा मैसूर अपनी आराध्य देवी के स्वागत में नतमस्तक हो गया हो। यहाँ दशहरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, शक्ति और विजय का महापर्व है।

राजाओं की नगरी और शाही विरासत

समाजसेवीका उषा केडिया कहती है कि मैसूर की पहचान उसके भव्य राजमहल और वाडियार राजवंश के गौरवशाली इतिहास से भी जुड़ी हुई है। यहाँ की राजसी परंपराओं ने सदियों से इस नगर की सांस्कृतिक पहचान को सँजोकर रखा है। मैसूर महल केवल पत्थरों और स्थापत्य कला से बनी एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का साक्षी है, जिसमें कला, संगीत, साहित्य और शाही वैभव को विशेष महत्त्व दिया जाता था।मैसूर दशहरे की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ आधुनिकता के साथ-साथ प्राचीन राज परंपराओं का भी सम्मान किया जाता है। शाही दरबार की परंपरा, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक आयोजन इस उत्सव को ऐतिहासिक गरिमा प्रदान करते हैं। दशहरे के अवसर पर राजमहल के भीतर आयोजित होने वाले पारंपरिक समारोह मैसूर के गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं। राजपरिवार की परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने के लिए लोग उत्सुक रहते हैं। यही कारण है कि मैसूर का दशहरा इतिहास और वर्तमान के बीच एक सुंदर सेतु बन जाता है।

रोशनी में नहाता मैसूर महल

दशहरे के दिनों में मैसूर महल की सुंदरता देखते ही बनती है। महल को हजारों बल्बों और आकर्षक रोशनी से सजाया जाता है। जब शाम ढलती है और पूरा महल रोशनी से जगमगाने लगता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती पर सितारों से सजा कोई भव्य स्वप्नलोक उतर आया हो।महल की भव्य इमारत, उसके गुंबद, मेहराबें और कलात्मक स्थापत्य रोशनी में निखर उठते हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। कैमरों में इस खूबसूरती को कैद करने की होड़ लगी रहती है, लेकिन महल की वास्तविक भव्यता का अनुभव आँखों से देखने पर ही होता है।दशहरे के दौरान आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम इस रौनक को और बढ़ा देते हैं। शास्त्रीय संगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक प्रस्तुतियाँ और विभिन्न कलात्मक आयोजन मैसूर की सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं।यहाँ की हर रोशनी मानो इतिहास की एक कहानी कहती है और हर सांस्कृतिक प्रस्तुति अपनी परंपराओं से जुड़ने का संदेश देती है।

स्वर्ण सिंहासन और राजसी वैभव

मैसूर दशहरे की शाही परंपराओं में स्वर्ण सिंहासन का विशेष स्थान है। यह सिंहासन वाडियार राजवंश के ऐतिहासिक गौरव और राजसी परंपरा का प्रतीक माना जाता है। दशहरे के अवसर पर इससे जुड़ी रस्में और शाही दरबार की परंपराएँ इस उत्सव को विशिष्ट गरिमा प्रदान करती हैं।स्वर्ण सिंहासन से जुड़ी परंपराओं में इतिहास, कला और राजपरिवार की विरासत का अद्भुत संगम दिखाई देता है। इसे देखने और इसके इतिहास के बारे में जानने की लोगों में विशेष उत्सुकता रहती है। यही विविधता भारत की सांस्कृतिक सुंदरता है। एक ही पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग परंपराओं और उत्सवों के माध्यम से मनाया जाता है, लेकिन उसका मूल संदेश समान रहता है-सत्य, साहस, धर्म और सदाचार की विजय ।मैसूर का दशहरा हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने, ऐतिहासिक विरासत का सम्मान करने और विविधता में एकता की भावना को समझने का अवसर देता है।
यहाँ आकर अनुभव होता है कि किसी शहर की वास्तविक पहचान केवल उसकी इमारतों या सड़कों से नहीं बनती, बल्कि उन परंपराओं से बनती है जिन्हें उसकी पीढ़ियाँ प्रेम और गर्व के साथ सँजोकर रखती हैं।

सचमुच, ख़ास है मैसूर का दशहरा

मैसूर का दशहरा एक ऐसा उत्सव है, जिसमें इतिहास की गरिमा है, भक्ति की शक्ति है, कला की सुंदरता है और संस्कृति का अनुपम वैभव है। चामुंडी पहाड़ी पर विराजमान माँ चामुंडेश्वरी के दर्शन से लेकर रोशनी में नहाते राजमहल तक और जंबो सवारी की भव्यता से लेकर लोककलाओं की रंगीन प्रस्तुतियों तक-हर दृश्य इस उत्सव को यादगार बना देता है।यहाँ की हवा में चंदन की सुगंध है, परंपराओं में राजसी गौरव है, लोगों के हृदय में देवी माँ के प्रति अटूट श्रद्धा है और उत्सव के प्रत्येक रंग में भारत की सांस्कृतिक आत्मा की झलक दिखाई देती है।मैसूर का दशहरा केवल आँखों को आनंदित करने वाला आयोजन नहीं, बल्कि हृदय को अपनी विरासत पर गर्व करने का अवसर भी देता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी परंपराएँ हमारी पहचान हैं और हमारी संस्कृति हमारी सबसे अमूल्य धरोहर ।
मैसूर का दशहरा सचमुच ख़ास है- क्योंकि यहाँ उत्सव केवल मनाया नहीं जाता, बल्कि इतिहास, स्था और संस्कृति के रूप में जिया जाता है

मैसूर के दशहरे को लेकर विस्तार पूर्वक जानकारी देने वाली समाजसेवीका श्रीमती उषा केडिया कर्नाटक राज्य के मैसूर शहर की निवासी है। एवं वे देश की प्रतिष्ठित साहित्यकार के साथ-साथ समाज के कामों में सदैव अग्रणी रहती है। उषा केडिया ने कहा कि इस शुभ अवसर पर आप सभी को महाराजा अग्रसेन जयंती, शारदीय नवरात्रि एवं विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई

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