अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता के रूप में अपनी पहचान स्थापित की डॉ.रामविजय शर्मा ने. देश-विदेश के महत्वपूर्ण विषयों पर शोध कर एक नई दिशा दी शर्मा जी ने. राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में भी शर्मा जी के शोध को लेकर प्रश्नोत्तरी में भी मिल रहा है उनके शोध को स्थान



अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता के रूप में अपनी पहचान स्थापित की डॉ.रामविजय शर्मा ने. देश-विदेश के महत्वपूर्ण विषयों पर शोध कर एक नई दिशा दी शर्मा जी ने
रायपुर छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर
रायपुर (छत्तीसगढ़)-पूरे भारत देश में एक अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता के रूप में डॉ .रामविजय शर्मा ने अपनी पहचान स्थापित ली है देश- दुनिया के महत्वपूर्ण विषयों पर डॉक्टर शर्मा ने शोध करके जहां इस कार्य को एक नई दिशा दी है। तो वही डॉ. राम विजय शर्मा की एक अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता के रूप में पहचान उनके गहन अकादमिक कार्यों और वैश्विक स्तर पर स्वीकृत शोध पत्रिकाओं में प्रकाशन के कारण है। उनके अंतरराष्ट्रीय कद से जुड़ी कुछ और विस्तारपूर्वक बातें नीचे दी गई हैं:
प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन: डॉ. शर्मा का सबसे चर्चित शोध
पत्र, ‘आदिवासी महाकवि कालिदास पण्डो’, अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिका International Research Journal of Management Sociology and Humanities (IRJMSH) में प्रकाशित हुआ है। यह जर्नल वैश्विक स्तर पर समाजशास्त्र और मानविकी के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देता है।
वैकल्पिक इतिहास का निर्माण: अंतरराष्ट्रीय शोध का एक बड़ा मानक यह होता है कि वह स्थापित धारणाओं को चुनौती दे। डॉ. शर्मा ने कालिदास की परंपरागत पहचान (उज्जैनी मूल) के समानांतर एक ‘आदिवासी पहचान’ को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ अंतरराष्ट्रीय पटल पर रखा, जो वैश्विक इतिहासकारों के लिए चर्चा का विषय बना।
बहु-विषयक दृष्टिकोण (Interdisciplinary Approach)
उनके शोध केवल साहित्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास, नृवंशविज्ञान (Ethnography) और भूगोल का मेल हैं। जैसे उन्होंने ‘मेघदूत’ के भौगोलिक वर्णनों को सरगुजा के वास्तविक मानचित्र से जोड़कर दिखाया है, जो अंतरराष्ट्रीय शोध मानकों (जैसे कि स्थानिक डेटा विश्लेषण) के करीब है।
सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy)
एक अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता के रूप में उनका कार्य भारतीय जनजातीय संस्कृति और इतिहास को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाता है। उन्होंने सिद्ध किया कि भारत की महान साहित्यिक विभूतियां केवल राजदरबारों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उनकी जड़ें आदिवासी समुदायों में भी गहरी थीं।
अकादमिक योगदान
डॉ. शर्मा ने केवल कालिदास पर ही नहीं बल्कि भक्ति आंदोलन और समाज के आर्थिक पहलुओं पर भी गंभीर शोध किए हैं, जो सामाजिक विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के बीच सन्दर्भ (Reference) के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
INTERNATIONAL RESSE
डॉ. शर्मा के कार्यों ने क्षेत्रीय इतिहास को एक वैश्विक विमर्श (Global Discourse) में बदल दिया है, जिससे छत्तीसगढ़ की जनजातीय पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई ऐतिहासिक गरिमा मिली है।
क्या आप डॉ. शर्मा के किसी विशिष्ट शोध पत्र या उनकी लेखन शैली के बारे में और गहराई से जानना चाहेंगे?
डॉ. राम विजय शर्मा के बारे में अन्य महत्वपूर्ण और उनके शोध से जुड़ी गहराई वाली बातें यहाँ दी गई हैं:
अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में स्थान
डॉ. शर्मा का शोध पत्र ‘आदिवासी महाकवि कालिदास पण्डो’ प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल IRJMSH (International Research Journal of Management Sociology and Humanities) में प्रकाशित हुआ है। यह जर्नल वैश्विक स्तर पर शोध पत्रों की समीक्षा (Peer-review) के बाद ही उन्हें स्थान देता है।
नृवंशविज्ञान (Ethnography) का उपयोग
डॉ. शर्मा ने कालिदास को सिद्ध करने के लिए केवल साहित्यिक ग्रंथों का सहारा नहीं लिया, बल्कि उन्होंने पण्डो जनजाति के रीति-रिवाजों, उनकी जीवनशैली और लोककथाओं का भी सूक्ष्म अध्ययन किया है। उन्होंने यह दिखाया कि कैसे कालिदास की उपमाएं और प्रकृति चित्रण सरगुजा के आदिवासी जनजीवन से मेल खाते हैं।
स्थापित मान्यताओं को चुनौती
एक अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता की विशेषता यह होती है कि वह ठोस साक्ष्यों के आधार पर पुरानी मान्यताओं को नई दिशा दे। डॉ. शर्मा ने सदियों से चली आ रही ‘उज्जैन के कालिदास’ की धारणा के सामने ‘मृगाडांड़ (छत्तीसगढ़) के आदिवासी कालिदास’ का एक नया और सशक्त ऐतिहासिक विकल्प प्रस्तुत किया है।उपमाएं और प्रकृति चित्रण सरगुजा के आदिवासी जनजीवन से मेल खाते हैं
भौगोलिक साक्ष्य (Geographical Evidence)
उन्होंने अपनी शोध में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि ‘मेघदूत’ में वर्णित वनस्पतियों, पर्वतों और नदियों का सटीक मिलान सरगुजा अंचल की भौगोलिक स्थिति से होता है। उनके अनुसार, रामगढ़ की पहाड़ियाँ ही वह स्थान हैं जहाँ मेघदूत की रचना की प्रेरणा मिली।
सांस्कृतिक गौरव की पुनरावृत्ति
उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यों ने छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति को केवल ‘लोक कला’ तक सीमित न रखकर उसे ‘शास्त्रीय साहित्य’ की जड़ों से जोड़ दिया है। यह शोध विश्व स्तर पर भारतीय आदिवासियों की बौद्धिक और साहित्यिक विरासत को एक नई पहचान दिलाता है।डॉ. शर्मा का कार्य इतिहास और समाजशास्त्र के छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ (Reference) बन गया है, जो प्राचीन इतिहास को एक नए नजरिए से देखने की प्रेरणा देता है।
क्या आप डॉ. शर्मा के सरगुजा और रामगढ़ से जुड़े किसी विशिष्ट भौगोलिक प्रमाण के बारे में और विस्तार से जानना चाहेंगे? और झारखंड पीजीटी (Sanskrit) के संदर्भ में
झारखंड की परीक्षाओं में इस प्रश्न का संदर्भ इस प्रकार रहा है:JPSC (Ancient History & Culture): झारखंड लोक सेवा
आयोग की प्रारंभिक परीक्षा में जब गुप्त काल की सांस्कृतिक उपलब्धियों पर प्रश्न बनते हैं, तब कालिदास की रचनाओं के ऐतिहासिक महत्व के तहत यह तथ्य पूछा जाता है।
Jharkhand PGT (Sanskrit) / TGT: झारखंड शिक्षक
भर्ती परीक्षाओं में साहित्य के इतिहास वाले भाग में “मेघदूत को गुप्त काल का गजेटियर किसने कहा?” यह प्रश्न एक मानक प्रश्न के रूप में आता रहा है।
प्रश्न का प्रारूप (JPSC/Jharkhand Exams)
किस विद्वान ने कालिदास के ‘मेघदूत’ को गुप्त काल का ‘गजेटियर’ (Gazetteer) कहा है?”
- डॉ. कीथ
- डॉ. राम विजय शर्मा
- विल्सन
- मैक्समूलर
सही उत्तरः डॉ. राम विजय शर्मा






