दान में भूमि दी, उसपर मंदिर बनवाकर जनता को समर्पित किया. श्री बैजू अग्रवाल की अनुपम विरासत.श्री बांके बिहारी मंदिर के साथ उसके रखरखाव के लिए भी दी संपत्तियां; अग्रवाल समाज की दानशीलता और धर्मरक्षा का जीवंत उदाहरण. राजधानी रायपुर में अग्रवाल समाज के दानवीरों को आज भी लोग करते हैं स्मरण

दान में भूमि दी, उसपर मंदिर बनवाकर जनता को समर्पित किया. श्री बैजू अग्रवाल की अनुपम विरासत.श्री बांके बिहारी मंदिर के साथ उसके रखरखाव के लिए भी दी संपत्तियां; अग्रवाल समाज की दानशीलता और धर्मरक्षा का जीवंत उदाहरण. राजधानी रायपुर में अग्रवाल समाज के दानवीरों को आज भी लोग करते हैं स्मरण kshititech
दान में भूमि दी, उसपर मंदिर बनवाकर जनता को समर्पित किया. श्री बैजू अग्रवाल की अनुपम विरासत.श्री बांके बिहारी मंदिर के साथ उसके रखरखाव के लिए भी दी संपत्तियां; अग्रवाल समाज की दानशीलता और धर्मरक्षा का जीवंत उदाहरण. राजधानी रायपुर में अग्रवाल समाज के दानवीरों को आज भी लोग करते हैं स्मरण kshititech
दान में भूमि दी, उसपर मंदिर बनवाकर जनता को समर्पित किया. श्री बैजू अग्रवाल की अनुपम विरासत.श्री बांके बिहारी मंदिर के साथ उसके रखरखाव के लिए भी दी संपत्तियां; अग्रवाल समाज की दानशीलता और धर्मरक्षा का जीवंत उदाहरण. राजधानी रायपुर में अग्रवाल समाज के दानवीरों को आज भी लोग करते हैं स्मरण kshititech

दान में भूमि दी, उसपर मंदिर बनवाकर जनता को समर्पित किया — श्री बैजू अग्रवाल की अनुपम विरासत.श्री बांके बिहारी मंदिर के साथ उसके रखरखाव के लिए भी दी संपत्तियां; अग्रवाल समाज की दानशीलता और धर्मरक्षा का जीवंत उदाहरण

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -अग्रवाल समाज की पहचान केवल व्यापार, पुरुषार्थ और समृद्धि से नहीं, बल्कि दान, धर्म, सेवा और लोककल्याण की गौरवशाली परंपरा से भी रही है। रायपुर के नयापारा-सदर बाजार क्षेत्र में स्थित प्राचीन श्री बांके बिहारी मंदिर इसी दानशील परंपरा की लगभग डेढ़ शताब्दी पुरानी एक अनुपम धरोहर है।
प्राप्त ऐतिहासिक एवं पारिवारिक जानकारी के अनुसार लगभग सन् 1870 में दानवीर श्री बैजू अग्रवाल जी ने अपनी भूमि पर श्री बांके बिहारी जी के मंदिर का निर्माण करवाया और उसे अपने परिवार की निजी संपत्ति बनाकर रखने के बजाय जनसाधारण के दर्शन, पूजा-अर्चना और धर्मसेवा के लिए समर्पित कर दिया।यही इस दान की सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने केवल भूमि दान नहीं की, बल्कि उस पर मंदिर का निर्माण करवाकर भगवान को प्रतिष्ठित किया और फिर उस देवस्थान को जनता को समर्पित कर दिया। आज लगभग डेढ़ शताब्दी बाद, मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण ट्रस्ट समिति ने करवाया है, असंख्य श्रद्धालु उसी पुण्यभूमि पर भगवान श्री बांके बिहारी जी के, साथ साथ मां दुर्गा बजरंगबली शिव दरबार महालक्ष्मी जी और श्री अग्रसेन- माधवी जी के दर्शन कर रहे हैं। यह उस पुण्य संकल्प की निरंतरता है, जो एक पूर्वज ने आने वाली पीढ़ियों के लिए किया था।

इतना ही नहीं, श्री बैजू अग्रवाल जी की दूरदर्शिता यह भी थी कि मंदिर बन जाने के बाद उसके रखरखाव, पूजा-पाठ और धार्मिक व्यवस्थाओं का खर्च भविष्य में किस प्रकार चलता रहेगा। इसी उद्देश्य से मंदिर से जुड़ी अन्य भूमि एवं संपत्तियां भी मंदिर समिति/व्यवस्था के लिए समर्पित की गईं, ताकि उनसे प्राप्त आय मंदिर की सेवा में उपयोग होती रहे।

मंदिर के सामने स्थित वह भूमि, जहां वर्तमान में कटारे महाराज निवास करते हैं तथा मंदिर के पीछे और बाजू में अनेक किराएदार रहते हैं, इसी व्यवस्था से जुड़ी भूमि है। इसके अतिरिक्त सदर बाजार में अनूपचंद त्रिलोकचंद ज्वेलर्स के पुराने शोरूम के ठीक सामने स्थित भूमि, जिस पर लगभग 300 वर्गफुट में दुकान निर्मित है, वह भूमि भी मंदिर के रखरखाव एवं नियमित व्यय के लिए आय का स्थायी स्रोत बने—इसी पवित्र भावना से मंदिर के लिए दान की गई थी।इस प्रसंग का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि किसी व्यक्ति ने अपनी बहुमूल्य भूमि दान कर दी। इसका वास्तविक महत्व उस दूरदर्शी सामाजिक सोच में है, जिसमें संपत्ति के साथ धर्म और समाज का अधिकार भी स्वीकार किया गया।

हमारे पूर्वजों ने कमाया भी, बचाया भी और परिवार को आगे बढ़ाया भी; लेकिन अपनी कमाई और संपत्ति का एक हिस्सा धर्म, समाज और जनकल्याण के लिए छोड़ना कभी नहीं भूले।

यही अग्रवाल समाज की मूल भावना रही है—बचत से परिवार का विकास और दान से समाज का विकास। समृद्धि के साथ सेवा, व्यापार के साथ परोपकार और संपत्ति के साथ धर्मरक्षा का भाव हमारी सामाजिक संस्कृति में सदैव विद्यमान रहा है।

श्री बैजू अग्रवाल जी का यह कार्य इस भावना का अत्यंत सुंदर उदाहरण है। उन्होंने केवल अपने समय के लिए मंदिर नहीं बनवाया, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित की कि मंदिर आने वाली पीढ़ियों तक जनता की आस्था का केंद्र बना रहे और उसकी सेवा-पूजा के लिए आर्थिक आधार भी उपलब्ध रहे।

आज जब हम श्री बांके बिहारी मंदिर में भगवान के सम्मुख शीश झुकाते हैं, तब उन पुण्यात्मा पूर्वजों के प्रति भी कृतज्ञ होना हमारा दायित्व है, जिनके त्याग, दान और धर्मनिष्ठा के कारण यह देवस्थान आज हमारे बीच विद्यमान है।

लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व अपनी भूमि पर मंदिर का निर्माण करवाकर उसे जनता को समर्पित करने वाले दानवीर श्री बैजू अग्रवाल जी को समाज का शत-शत नमन।

उनका यह पुण्य कार्य हमें आज भी संदेश देता है कि संपत्ति की सार्थकता केवल उसके संग्रह में नहीं, बल्कि उसके उस अंश में है जो समाज, धर्म और आने वाली पीढ़ियों के काम आए।” उपरोक्त जानकारी डॉ. अशोक अग्रवाल
अध्यक्षश्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट नयापारा, रायपुर (छत्तीसगढ़) द्वारा दी गई है

दान में भूमि दी, उसपर मंदिर बनवाकर जनता को समर्पित किया. श्री बैजू अग्रवाल की अनुपम विरासत.श्री बांके बिहारी मंदिर के साथ उसके रखरखाव के लिए भी दी संपत्तियां; अग्रवाल समाज की दानशीलता और धर्मरक्षा का जीवंत उदाहरण. राजधानी रायपुर में अग्रवाल समाज के दानवीरों को आज भी लोग करते हैं स्मरण kshititech
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