कांग्रेस संसदीय दल की चेयर पर्सन सोनिया गांधी ने कहा-डिलिमिटेशन जनगणना के बाद ही होना चाहिए. मोदी सरकार 16 अप्रैल को विशेष सत्र बुलाकर राजनैतिक रोटियां सेंकना चाहती है. सोनिया ने कहा- 29 अप्रैल के बाद मोदी जी को बुलानी थी सर्वदलीय बैठक



कांग्रेस संसदीय दल की चेयर पर्सन सोनिया गांधी ने कहा-डिलिमिटेशन जनगणना के बाद ही होना चाहिए
शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर
शक्ति -कांग्रेस सांसदीय दल की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा है कि जैसा अब तक होता आया है। यह भी जरूरी है कि कोई भी डिलिमिटेशन, जिससे लोकसभा की सीटें बढ़ती हों, उसे गणितीय ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी निष्पक्ष होना चाहिए।’महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन के मुद्दे पर सोनिया गांधी का कहना है कि बहस का मुद्दा डिलिमिटेशन (परिसीमन) है, महिला आरक्षण नहीं!प्रधानमंत्री जी विपक्षी दलों से उन विधेयकों को सपोर्ट की अपील कर रहे हैं, जो केंद्र सरकार संसद के एक विशेष सत्र में उस समय लाकर सभी पर थोपना चाहती है, जब तमिलनाडु ओट पश्चिम बंगाल में चुनावी अभियान सबसे जोटों पर हैं। इस असाधारण हड़बड़ी का कारण केवल एक ही हो सकता है, और वह है टाजनीतिक लाभ उठाना और विपक्ष के ऊपर हावी होना।हमेशा की तरह प्रधानमंत्री जी ने एक बार फिर सच्चाई को आधा-अधूरा पेश किया है।
कांग्रेस चेयरपर्सन सोनिया गांधी का कहना है कि सितंबर 2023 में संसद के एक विशेष सत्र में नाटी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023′ एकमत से पारित हुआ। इस अधिनियम के अंतर्गत संविधान में अनुच्छेद 334-A जोड़ा गया, जिसके अनुसार लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिया जाना अनिवार्य हो गया, जिसके लागू होने के लिए अगली जनगणना और जनगणना के आधार पर डिलिमिटेशन प्रक्रिया पूटी होने की शर्त तय की गई। विपक्ष ने यह अधिनियम लागू होने के लिए ऐसी किसी शर्त की मांग नहीं की थी, बल्कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता श्री मल्लिकार्जुन खटगे ने टड़ता से यह बात उठाई थी कि महिलाओं का आरक्षण साल 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू कर दिया जाए। लेकिन भाजपा की केंद्र सरकार इसके लिए सहमत नहीं थी, जिसका कारण उनके सिवाय और कोई नहीं जानता। अब हमें यह बताया जा रहा है कि अधिनियम 334-A में संशोधन किया जाएगा ताकि महिलाओं का आरक्षण साल 2029 से लागू हो सके। प्रधानमंत्री जी को अपना निर्णय बदलने में 30 महीने क्यों लग गए, तथा विशेष सत्र बुलाने के लिए कुछ हफ्तों का इंतजार करने में उन्हें क्या परेशानी है? विपक्ष के नेताओं ने भाजपा की केंद्र सरकार को एक बार नहीं, बल्कि तीन बार पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि केंद्र सरकार के नए प्रस्तावों पर चर्चा करने के लिए सर्वदलीय बैठक 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में चुनावों का आखिटी चरण समाप्त होने के बाद बुलाई जाए। लेकिन प्रधानमंत्री जी ने इस वाजिव अनुटोध को भी खारिज कर दिया, और अपनी बात मनवाने के लिए समाचार पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने, राजनीतिक पार्टियों से अपील करने और सम्मेलनों का आयोजन करने का रास्ता चुना। यह उनकी एक कपटी चाल है, जो प्रधानमंत्री जी के अहंकार और मेरी मर्जी वाले रवैये को दिखाती है।कांग्रेस सरकार के समय अप्रैल 1993 और जून 1993 में संसद में क्रमशः 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक पारित कराए गए थे। इन विधेयकों – पर लगभग पाँच साल तक चर्चा और बहस चली थी, जिसके बाद पंचायत और नगरपालिका चुनावों में महिलाओं के आरक्षण का कानून बना। यह स्वर्गीय प्रधानमंत्री, श्री राजीव गांधी की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। आज पंचायतों और नगरपालिकाओं में लगभग 15 लाख निर्वाचित महिलाएं हैं, जिनकी संख्या प्रतिनिधियों की कुल संख्या के 40% से भी अधिक है। जारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 की बुनियाद भी यहीं उपलब्धि है।पिछली जनगणना साल 2021 में होनी चाहिए थी, । जिसे मोदी सरकार द्वाटा लगातार टाला जाता रहा। इसका एक नतीजा यह हुआ कि 10 करोड़ से अधिक लोग ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अंतर्गत अपने कानूनी अधिकार से वंचित हो गए। प्रधानमंत्री कल्याण अन्न योजना की बुनियाद यहाँ अधिनियम था। जनगणना का काम पाँच साल के अनावश्यक विलंब से शुरू किया गया। अब यह हिंडोरा पीट कर अपनी पीठ थपथपाई जा रही है कि यह एक डिजिटल जनगणना है। वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा यह सार्वजनिक घोषणा की जा चुकी है कि डिजिटल होने के कारण, जनगणना के अधिकांश आंकड़े 2027 में ही उपलब्ध हो पाएंगे। इसलिए यह सत्र बुलाने और डिलिमिटेशन कटाने की इतनी हड़बड़ी के लिए मोदी सरकार के पास कोई भी ठोस वजह नहीं है
सोनिया गांधी ने कहा कि ठीक एक साल पहले, मोदी जी ने घोषणा की थी कि 2027 की जनगणना में जाति-आधारित जनगणना भी शामिल होगी, बावजूद इसके कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करके और संसद में उठाए गए सवालों के जवाब में जाति-आधारित जनगणना के विचार को ही खारिज कर दिया था, और बावजूद इसके भी, कि मोदी जी ने जाति-आधारित जनगणना की मांग करने वाले कांग्रेस नेताओं पर यह आरोप लगाया था कि वो “शहरी नक्सल मानसिकता से पीड़ित हैं। चाहे जो हो, साल 2027 की जनगणना में जाति के आधार पर जनगणना को शामिल कर लिया गया है, ताकि सभी के लिए सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण सुनिश्चित हो सके। विहार और तेलंगाना टाज्यों में व्यापक जातिगत सर्वे करवाए गए हैं, और इस पूटी प्रक्रिया में छह महीने से अधिक का समय नहीं लगा।इससे यह स्पष्ट है कि जातिगत जनगणना करवाने पर 2027 की जनगणना को प्रकाशित करने में और ज्यादा देर होगी, यह तर्क पूटी तरह से बेबुनियाद है। वास्तव में मोदी जी का इरादा जातिगत जनगणना में लेट करना और उसे विफल बनाना है।मोदी सरकार द्वाटा बुलाया गया विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू होने वाला है। इसके बाद भी सांसदों को अब तक कोई भी आधिकारिक प्रस्ताव नहीं दिया गया है कि इस सत्र में मोदी सरकार किस बात पर चर्चा करना चाहती है। ऐसा लगता है कि डिलिमिटेशन के लिए कोई फॉर्मूला पेश किया जाएगा।डिलिमिटेशन जनगणना के बाद ही होना चाहिए, जैसा अव तक होता आया है। यह भी जरूरी है कि कोई भी डिलिमिटेशन, जिसमे लोकसभा की सीटें बढ़ती हों, उसे गणितीय ही नहीं, बल्कि टराजनीतिक रूप से भी निष्पक्ष होना चाहिए। जो राज्य परिवार नियोजन में अग्रणी रहे हैं, और जो छोटे टाज्य हैं, उन्हें तुलनात्मक रूप से या पूरी तरह से कोई भी नुकसान नहीं होना चाहिए।अगर बढ़ोत्तरी अनुपात में होगी, तो सापेक्ष नुकसान का असर कम हो जाएगा, क्योंकि कुल संख्या में जी अंतर होगा, वह भी बड़ा हो जाएगा।नाटी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023′ में ‘आरक्षण के अंदर आरक्षण का प्रावधान है, यानी क्रमशः अनुसूचित जातियों औट अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में से भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।सितंबर 2023 में हुई बहस के दौरान, राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने यह मांग की थी कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं को भी इसी तरह का आरक्षण मिलना चाहिए। उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी में पहले से ही OBC को आरक्षण दिया जाता है।संसद का मॉनसून सत्र जुलाई के मध्य में शुरू होगा। अगर सरकार 29 अप्रैल के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष के साथ अपने प्रस्तावों पर चर्चा करती, सार्वजनिक बहस के लिए समय देती, और फिट मॉनसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयकों पर विचार करती, तो इससे कोई आसमान नहीं टूट पड़ता। इतनी हड़बड़ी में यह सत्र बुलाए जाने का कोई उचित कारण नहीं है, सिवाय इसके कि मोदी सरकार मुश्किल समय में निगेटिव मेनेजमेंट’ करके अपनी राजनीतिक रोटिया सेंकना चाहती है और हमारी रव्यवस्था में दूरगामी महत्व रखने वाले बदलावों को जल्दवाजी में थोपना चाहती है। यहाँ पर अधिनियम नहीं, बल्कि यह प्रक्रिया दोषपूर्ण है, जो पूटी तरह से लोकतंत्र विटोधी है। महिलाओं के आरक्षण पर कोई विवाद नहीं है। यह एकमत से पारित हो चुका है। असली बहस डिलिमिटेशन को लेकर है, जो अनौपचारिक रूप से उपलब्ध हुई जानकारी के मुताविक बेहद खतरनाक है और संविधान पर एक आघात है।



