नेताओं का कद पद से नहीं. कार्यकर्ताओं के प्रति प्रतिबद्धता से तय होता है- सामाजिक कार्यकर्ता मनोज शुक्ला की कलम से मनोज ने कहा- राजनीति का एक दौर था- जब नेता अपने कार्यकर्ता के लिए लाठी खाते थे एवं मुकदमे भी झेलते थे. आज की राजनीति में बड़ा सवाल- क्या कार्यकर्ताओं के प्रति वैसी प्रतिबद्धता दिखती है

नेताओं का कद पद से नहीं. कार्यकर्ताओं के प्रति प्रतिबद्धता से तय होता है- सामाजिक कार्यकर्ता मनोज शुक्ला की कलम से मनोज ने कहा- राजनीति का एक दौर था- जब नेता अपने कार्यकर्ता के लिए लाठी खाते थे एवं मुकदमे भी झेलते थे. आज की राजनीति में बड़ा सवाल- क्या कार्यकर्ताओं के प्रति वैसी प्रतिबद्धता दिखती है kshititech
रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता मनोज शुक्ला

नेताओं का कद पद से नहीं. कार्यकर्ताओं के प्रति प्रतिबद्धता से तय होता है- सामाजिक कार्यकर्ता मनोज शुक्ला की कलम से

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -छत्तीसगढ़ प्रदेश की राजधानी रायपुर के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मनोज शुक्ला ने सोशल मीडिया के माध्यम से राजनैतिक परिवेश पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए लिखा है कि राजनीति में नेताओं का कद उनके पद से नहीं बल्कि अपने कार्यकर्ताओं के प्रति प्रतिबद्धता से तय होता है। श्री शुक्ला जी कहते हैं कि कार्यकर्ता की एक आवाज और नेताओं ने थाने में मचा दिया कोहराम , लॉकअप से बाहर ले आए आर्यकर्ता।वह दौर अलग था। न सत्ता थी, न सत्ता में आने की कोई तत्काल संभावना। संगठन चलाने के लिए कार्यकर्ता ढूंढने पड़ते थे, पदाधिकारी बनाने के लिए लोगों को तैयार करना पड़ता था। लेकिन उस दौर के नेताओं की एक सबसे बड़ी पहचान थी—वे अपने कार्यकर्ता को कभी अकेला नहीं छोड़ते थे उनके लिए लड़ते थे खुद का चाहे कितना बड़ा नुकसान ना हो जाए

मनोज शुक्ला बताते हैं कि वह साल 1987 -88 की बात है। उस समय देवजी भाई पटेल भाजयुमो के अध्यक्ष थे। बृजमोहन अग्रवाल प्रदेश मंत्री के रूप में छत्तीसगढ़ में युवाओं के बीच दबंग व संघर्षशील नेतृत्व का चेहरा बन चुके थे। ओमप्रकाश पुजारी और सुभाष तिवारी जैसे फायरब्रांड नेता संगठन की ताकत थे।एक चक्का जाम आंदोलन के दौरान पुलिस अधिकारियों से सड़क पर बहस हुई थी , विवेकानंद आश्रम के तीन कार्यकर्ताओं—अजय तिवारी (बल्ले), अशोक ठाकुर और उनके एक साथी—को आजाद चौक थाना पुलिस पकड़कर ले गई।कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटने लगी तो उन्हें वहां से कोतवाली शिफ्ट कर दिया गया।यह मोबाइल, व्हाट्सएप और सोशल मीडिया का युग नहीं था। सूचना पहुंचाने का माध्यम था कार्यकर्ता का समर्पण। एक युवा कार्यकर्ता साइकिल उठाकर जवाहर नगर स्थित भाजपा कार्यालय और गंजपारा स्थित बृजमोहन अग्रवाल के एबीसी इंटरप्राइजेस के कार्यालय पहुंचा। खबर मिलते ही माहौल बदल गया।ओमप्रकाश पुजारी वहीं मौजूद थे। बृजमोहन अग्रवाल अधिकारियों से फोन पर बात कर रहे थे। स्पष्ट संदेश था—यदि कार्यकर्ताओं को नहीं छोड़ा गया तो बड़ा आंदोलन होगा, ईट से ईट बजा देंगे।कुछ ही देर में युवा मोर्चा के नेता और कार्यकर्ता कोतवाली पहुंच गए।थाने के भीतर पुलिस अधिकारियों से लंबी बहस हुई, पुलिस अधिकारी अड़े रह इनके खिलाफ पहल ही कई मामले दर्ज है ,पुलिस अपने अधिकार और दबाव दिखा रही थी, लेकिन नेताओं ने भी साफ कर दिया कि आपने अभी इसे चक्का जाम के कैस पर उठाया है और बात अभी सिर्फ इसी पर होगी? निर्दोष कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोई समझौता नहीं, कोई पीछे हटना नहीं। थाने से कार्यकर्ता लेकर ही जायेंगे ,नहीं तो हम भी थाने के अंदर लॉकअप में रहेगे ,माहौल उग्रता की ओर बढ़ते गया ,ओमप्रकाश पुजारी फूल फार्म में आ गए और पुलिस से पुलिस की भाषा में चर्चा ,स्कूटर की डिग्गी से अपना वकालत का कोर्ट मंगाकर पहन लिया ,पुलिस अधिकारियों का कोई लिहाज नहीं

,महज आधे घंटे के भीतर बिना किसी केस के कार्यकर्ता लॉकअप से बाहर थे। पुलिस प्रशासन को झुकना पड़ा और कार्यकर्ता अपने नेताओं के साथ सम्मानपूर्वक बाहर निकले।यही वह राजनीति थी, जहां नेता का कद उसकी कुर्सी से नहीं, बल्कि कार्यकर्ता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से तय होता था। नेता अपने कार्यकर्ता के लिए लाठी खाते थे, जेल जाते थे, मुकदमे झेलते थे, लेकिन साथ नहीं छोड़ते थे।आज राजनीति के साधन बढ़ गए हैं, तकनीक बढ़ गई है, संसाधन बढ़ गए हैं, लेकिन अक्सर यह सवाल सुनाई देता है—क्या कार्यकर्ता और नेता के बीच वैसा भरोसा, वैसा अपनापन और वैसी प्रतिबद्धता आज भी बची है?यही प्रश्न इस घटना को याद करते समय मन में बार-बार उठता है। क्योंकि संगठन की असली ताकत भवनों, बैनरों और पदों में नहीं, बल्कि कार्यकर्ता और नेतृत्व के बीच के उस अटूट विश्वास में होती है।

प्रातिक्रिया दे

Discover more from GL News

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading