पुरुषोत्तम मास आज से… 17 मई से 15 जून तक जीवन को रीसेट करने का आध्यात्मिक अवसर है पुरुषोत्तम मास-शिव नारायण मूंधड़ा-वास्तु मित्र”(94252 02721)



पुरुषोत्तम मास आज से… 17 मई से 15 जून तक जीवन को रीसेट करने का आध्यात्मिक अवसर है पुरुषोत्तम मास-शिव नारायण मूंधड़ा-वास्तु मित्र”(94252 02721)
रायपुर छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर
शक्ति -जप, तप, दान, सत्संग और आत्मचिंतन का विशेष महत्व।भारतीय कालगणना केवल तिथियों और ग्रह-नक्षत्रों का गणित नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने वाली गहन आध्यात्मिक व्यवस्था है। इसी व्यवस्था में आने वाला अधिक मास मनुष्य को आत्मचिंतन और आत्मसुधार का विशेष अवसर देता है। इसे सनातन परंपरा में ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा गया है। इस बार यह रविवार, 17 मई से 15 जून तक मनाया जाएगा। उपरोक्त जानकारी देते हुए एक बेट वार्ता ने देश के सुप्रसिद्ध वास्तु मित्र श्रीशिवनारायण मुंधडा रायपुर छत्तीसगढ़ ने बताया कि हर तीन वर्ष में आने वाला यह काल मानो प्रकृति द्वारा दिया गया ऐसा विराम है, जिसमें व्यक्ति अपने कर्मों, संबंधों और जीवन-दिशा का शांत मन से पुनर्मूल्यांकन कर सके। सनातन संस्कृति में ‘पुरुषोत्तम’ का अर्थ है- अपने सामान्य पुरुषार्थ के स्तर से ऊपर उठकर उत्तम की ओर अग्रसर होना
यह मास को अपनी दुर्बलताओं, भौतिक आकर्षणों औरनकारात्मक प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर आत्मिक उन्नयन की प्रेरणा देता है। यह स्वयं के भीतर झांकने और जीवन को बेहतर बनाने का अवसर भी है। मनुष्य वर्षों तक संसार की आपाधापी में कई प्रकार के कर्म करता है कुछ शुभ, कुछ अशुभ, कुछ विवेकपूर्ण तो कुछआवेशपूर्ण। पुरुषोत्तम मास मानो यह संदेश देता है कि व्यक्ति कुछ समय रुककर स्वयं को देखे, अपने तौले और अपनी त्रुटियों में सुधार करे। इसी कारण इस मास में जप, तप, दान, स्वाध्याय, सत्संग और आत्मचिंतन को विशेष महत्व दिया गया है। यह मास संकेत देता है कि जीवन केवल भौतिक इच्छाओं, प्रतिस्पर्धा, उपलब्धियों तक सीमित हो जाए, तो आत्मा (सूर्य) व कर्मों (शनि) का संतुलन बिगड़ जाता है। इसलिए यह नई भौतिक शुरुआतों से अधिक आत्ममंथन और कर्म-संशोधन के लिए उत्तम मास है।टूटे संबंधों को जोड़ने, गलतियां मानने और खुद को बेहतर बनाने का मौका प्रेरणा देता है, यह समय ग्रहों के भय में जीने का नहीं, बल्कि ग्रहों के कारक तत्वों को समझकर स्वभाव और कर्मों को सुधारने की प्रेरणा देता है।याद दिलाता है, यह मास स्मरण कराता है कि जीवन केवल अर्जन का नहीं, बल्कि संवेदना, संतुलन, सामाजिक उत्तरदायित्व का भी नाम है।बेहतरी का अवसर, इसकी भावना सही अर्थों में अपनाएं तो यह टूटे संबंधों को जोड़ने, गलतियों को मानने, खुद को बेहतर बनाने का मौका है।उत्तम बनाता है, हमें सिखाता है कि संसार को बदलने से पहले स्वयं को बदलना जरूरी है। जब मनुष्य संयम, सेवा और साधना से कर्म संतुलित करता है, तभी उसका पुरुषार्थ ‘उत्तम’ बनता है






