सद्गुरु रितेश्वर जी महाराज ने कही बड़ी बात-पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता घटाकर गोवंश और बैलगाड़ी की परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा. रितेश्वर जी के बयान के बाद देश में चर्चाओं का बाजार गर्म- वर्तमान आधुनिकता के दौर में कितनी प्रासंगिक है रितेश्वर जी की बातें




सद्गुरु रितेश्वर जी महाराज ने कही बड़ी बात-पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता घटाकर गोवंश और बैलगाड़ी की परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा
शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर
शक्ति -लंदन में कथा करने से अधिक आवश्यक है भारत को अपनी जड़ों से जोड़ना; बैलगाड़ी यात्रा के माध्यम से दिया भारतीय संस्कृति, गोवंश संरक्षण, प्राकृतिक कृषि और आत्मनिर्भर ग्राम्य जीवन का संदेशशिवरीनारायण, छत्तीसगढ़। आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटती भारतीय ग्रामीण परंपराओं, गोवंश आधारित कृषि और बैलगाड़ी संस्कृति के पुनर्जागरण का संदेश देते हुए सद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी ने एक अनूठी पहल की। श्री आनंदम धाम, शिवरीनारायण से पारंपरिक बैलगाड़ी पर सवार होकर निकले सद्गुरु ने समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, प्रकृति और प्राचीन भारतीय जीवन-पद्धति से पुनः जुड़ने का आह्वान किया।इस अवसर पर सद्गुरु श्री ने लंदन में कथा करने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए भारतीय समाज को अपनी ही धरती पर अपनी मूल संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता का संदेश दिया। उनका भाव था कि विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही आवश्यक है कि भारत के गाँवों में उसकी प्राचीन जीवन-पद्धति पुनः जीवंत हो। केवल संस्कृति का गौरवगान करने से नहीं, बल्कि उसे अपने व्यवहार और दैनिक जीवन में अपनाने से ही उसका वास्तविक संरक्षण संभव है।
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती निर्भरता के बीच बैलगाड़ी का महत्व समझना होगायात्रा के दौरान मीडिया से चर्चा में पेट्रोल-डीजल पर बढ़ती निर्भरता का विषय भी सामने आया। इस संदर्भ में बैलगाड़ी यात्रा के माध्यम से ईंधन की अनावश्यक खपत कम करने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और परंपरागत परिवहन साधनों के महत्व की ओर ध्यान आकर्षित किया गया।आधुनिक जीवन में पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की उपयोगिता अपनी जगह है, लेकिन प्रत्येक छोटे-बड़े कार्य के लिए इन पर बढ़ती निर्भरता से खर्च और संसाधनों की खपत भी बढ़ रही है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप बैलगाड़ी जैसे पारंपरिक साधन आज भी उपयोगी हो सकते हैं। यह पहल आधुनिक तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि आवश्यकता के अनुसार संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और भारतीय परंपराओं के संरक्षण का संदेश है।अब गोवंश को पुनः भारतीय कृषि और ग्राम्य जीवन का आधार बनाना होगासद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी ने गोवंश के महत्व की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करते हुए उसे भारतीय कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर जीवनशैली का महत्वपूर्ण आधार बताया। भारतीय गाँवों में कभी गोवंश केवल पशुपालन तक सीमित नहीं था, बल्कि खेती, परिवहन, जैविक खाद और दैनिक जीवन की अनेक आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ था।गौ-आधारित कृषि, प्राकृतिक खेती और गोवंश संरक्षण को प्रोत्साहन देकर ग्रामीण जीवन को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य किया जा सकता है। इस यात्रा के माध्यम से संदेश दिया गया कि गोवंश केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि हमारी कृषि परंपरा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण अंग है।बैलगाड़ी केवल सवारी नहीं, भारतीय सभ्यता की जीवंत धरोहर बैलगाड़ी भारतीय गाँवों की उस जीवन-पद्धति का प्रतीक रही है, जिसमें मनुष्य, पशु, प्रकृति और कृषि के बीच गहरा सामंजस्य था। कभी गाँवों की पहचान बैलगाड़ियों, गौशालाओं, खेत-खलिहानों, संयुक्त परिवारों और पारस्परिक सहयोग से हुआ करती थी।सद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी समय-समय पर अपने प्रवचनों में गाँवों की सरल जीवनशैली, संयुक्त परिवार की महत्ता, गोवंश संरक्षण, प्राकृतिक कृषि और भारतीय संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते रहे हैं। उनका संदेश रहा है कि आधुनिक सुविधाओं के बीच मनुष्य अपनी मूल पहचान, पारिवारिक मूल्यों और प्रकृति से जुड़ाव को न भूले।आधुनिकता अपनाएँ, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों को न भूलेंइस सांस्कृतिक यात्रा का प्रमुख संदेश रहा कि विकास का अर्थ अपनी प्राचीन परंपराओं से दूर होना नहीं है। आधुनिक तकनीक और सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी गोवंश, कृषि परंपरा, पर्यावरण, ग्रामीण आत्मनिर्भरता और संयुक्त परिवार जैसे भारतीय जीवन-मूल्यों का संरक्षण आवश्यक है।
भारतीय संस्कृति का वास्तविक गौरव केवल उसके इतिहास में नहीं, बल्कि उसके श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों को वर्तमान में पुनः स्थापित करने में है। गाँवों की सरलता, परिवारों की एकता, परस्पर सहयोग और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन आज भी समाज को नई दिशा दे सकते हैं।श्री आनंदम धाम से निकली सद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी की यह बैलगाड़ी यात्रा केवल एक पारंपरिक सवारी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण, पेट्रोल-डीजल पर अनावश्यक निर्भरता घटाने, गोवंश संरक्षण, गौ-आधारित कृषि और आत्मनिर्भर ग्राम्य व्यवस्था को पुनः प्रतिष्ठित करने का एक प्रेरक सांस्कृतिक आह्वान बनकर सामने आई।इस यात्रा का मूल संदेश था—आओ लौट चलें अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा और अपने गाँव की ओर। क्योंकि भारत की वास्तविक पहचान उसके गाँवों, किसानों, गोवंश, संयुक्त परिवारों और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन में निहित है।





