ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । युग ऋषि पंडित श्रीराम शर्मा जी के अमृतवाणी

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । युग ऋषि पंडित श्रीराम शर्मा जी के अमृतवाणी kshititech
पंडित श्रीराम शर्मा जी आचार्य

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । युग ऋषि पंडित श्रीराम शर्मा जी के अमृतवाणी

हरिद्वार से हमारे संवाददाता की विशेष खबर

हरिद्वार -मजबूत चीजों को ग्रहण करने के लिए मजबूत चीजें चाहिए। एटामिक भट्टी बनायी जाती है तो उसके चारों ओर घेरे इतने मजबूत बनाये जाते हैं कि उसके भीतर से रेडिएशन निकलकर कहीं आस-पास के इलाके में न फैल जाएँ। ये घेरे बहुत मजबूत बनाये जाते हैं। इसी तरह आध्यात्मिक शक्तियों को भीतर से जिस किसी आदमी को अवतरित करने की इच्छा हो, हनुमान जी को शंकर जी को भीतर अवतरित करने की इच्छा हो तो उसे अपने को इस लायक बनाना पड़ेगा कि शंकरजी आएँ तो वहाँ निवास कर सकें। कमजोर आदमी – स्वार्थी, चालाक, दिलासी आदमी उसको धारण नहीं कर सकते। यदि आती भी हैं तो या तो टक्कर मारकर वापस चली जाती हैं या फट जाती हैं। फट जाने से मतलब पागल हो जाते हैं। दिमाग खराब हो जाता है, जैसे रावण का हो गया था, कंस का हो गया था, भस्मासुर का हो गया था। दैवी शक्तियों को प्राप्त कर लेना सुगम है, पर उनको पचा डालना बड़ा मुश्किल है। वे हजम नहीं होतीं। पारा हजम नहीं होताआध्यात्मिक शक्तियाँ हजम नहीं होतीं। हजम करने का वक्त आता है तो आदमी पागल हो जाता है – लोकेषणा, पुत्रेषणा और वित्तेषणा के आधार पर। आध्यात्मिकता जब आती है तो भीतर जो कुछ भी है, उसको पहले बाहर निकालती है। दुर्वासा ऋषि के भीतर आध्यात्मिकता आयी थी तो क्रोध काबू से बाहर हो गया था। जो कुछ भी हमारे भीतर चीजें हैं, वे बढ़ेंगी। हमारे अन्दर कामुकता है तो कामुकता बढ़ जाएगी। आप नवरात्रि का अनुष्ठान कीजिए, यदि आपके पास संयम के विचार नहीं हैं, तो निश्चित रूप से कामुकता बढ़ेगी। क्रोध आपके भीतर भरा है और उसका परिशोधन नहीं किया गया है और आध्यात्मिक शक्तियों का अनुष्ठान आपने किया हैं तो मैं बताता हूँ कि क्रोध आपके भीतर बढ़ जाएगा। जो भी चीज आपके भीतर है— ज्ञान आपके भीतर है तो ज्ञान बढ़ जाएगा। भक्ति है तो भक्ति बढ़ जाएगी। अनुष्ठान का काम शक्ति उत्पन्न करना है। यह शक्ति किसमें खर्च होगी ? जो कुछ भी है, उसी में खर्च होगी ।

प्राप्त करना कोई मुश्किल नहीं है, तप करना कठिन है। गुरुदेव ने मुझे सामर्थ्यवान और शक्तिशाली बनने के लिए तपस्वी होने के लिए आज्ञा दी और मैं चौबीस साल तक तप करता रहा। जिव्हा के तप के बारे में आपको मालूम है न कि चौबीस साल तक जौ की रोटी और छाछ के ऊपर निकाले हैं और बाकी तप की बातें कैसे बताएँ कि कैसे कहें, किसी ने देखा नहीं ? हम बराबर तप करते रहे और अपने आपको मजबूत बनाते रहे चौबीस साल तक। गुरुदेव की कृपा रही और लोहा, पारस को छूकर सोना हो गया। मेरे गुरुदेव ने मुझे दो चीजें दीं पहले दिन जिनको पाकर मैं धन्य हो गया। उन दो चीजों से मेरी जिन्दगी पार हो गयी, जो पहले दिन उन्होंने दीं। तीसरी चीज की फिर मुझे कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ी, वही वरदान काफी था। क्या थीं वे दो चीजें ? एक तो उन्होंने मेरी कुण्डलिनी शक्ति जगा दी पहले दिन और दूसरा उन्होंने मेरे ऊपर शक्तिपात कर दिया। गुरुकृपा का यह अनुग्रह रहा मेरे ऊपर इसी तरह का कहीं आपको भी लाभ मिल सके तो आप भी सौभाग्यवान हो जाएँ। मैं भी सौभाग्यवान हूँ। मैं अपने गुरु को पाकर धन्य हो गया। हम दोनों एक-दूसरे को पाकर धन्य हो गये। उन्होंने मेरी शक्ति जगा दी, मेरे ऊपर शक्तिपात कर दिया

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