शक्ति जिले में कलेक्टर तोपनो साहब के मार्गदर्शन में जिला कृषि विभाग ने नील हरित काई एवं हरी खाद को बढ़ावा देने हेतु बीआरसी (जैव संसाधन केन्द्र) मे किया गया प्रशिक्षण आयोजित. नई तकनीक से जिले के किसान हुए अवगत

शक्ति जिले में कलेक्टर तोपनो साहब के मार्गदर्शन में जिला कृषि विभाग ने नील हरित काई एवं हरी खाद को बढ़ावा देने हेतु बीआरसी (जैव संसाधन केन्द्र) मे किया गया प्रशिक्षण आयोजित. नई तकनीक से जिले के किसान हुए अवगत kshititech
जिला कृषि विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम

नील हरित काई एवं हरी खाद को बढ़ावा देने हेतु बीआरसी (जैव संसाधन केन्द्र) मे किया गया प्रशिक्षण आयोजित

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -कलेक्टर श्री अमृत विकास तोपनो के निर्देशन एवं उप संचालक कृषि, जिला सक्ती के मार्गदर्शन में मृदा स्वास्थ्य में सुधार और कृषि उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से एक टिकाऊ एवं लागत प्रभावी कृषि पद्धति के रूप में हरी खाद के महत्व को रेखांकित करते हुए आज जिले में स्थापित बीआरसी (जैव संसाधन केन्द्र) में प्रशिक्षण आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों के बीच हरी खाद के उपयोग को बढ़ावा देना रहा। प्रशिक्षण अनुविभागीय कृषि अधिकारी एवं सहायक मिट्टी परीक्षण अधिकारी, सक्ती द्वारा प्रदान किया गया। प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि नील हरित काई को वैज्ञानिक रूप से सायनोबैक्टीरिया कहा जाता है। यह प्रकाशसंश्लेषी जीव होते हैं, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता रखते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होती है। इसके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों जैसे यूरिया एवं डीएपी की आवश्यकता में कमी आती है, जिससे खेती की लागत घटती है और पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है। नील हरित काई के उत्पादन के लिए आवश्यक अधोसंरचना 2×1 वर्ग मीटर के आकार की होती है, जिसमें कन्हार मिट्टी 10 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर का उपयोग किया जाता है। इसके साथ सिंगल सुपर फास्फेट 200 ग्राम प्रति वर्ग मीटर, बुआई हेतु बीज 100 ग्राम प्रति वर्ग मीटर तथा नील हरित काई का मातृ कल्चर 100 ग्राम प्रति वर्ग मीटर निर्धारित मात्रा में उपयोग किया जाता है, जिससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त होता है। हरी खाद के उपयोग से मृदा संरचना में सुधार होता है, जल धारण क्षमता बढ़ती है, मृदा अपरदन में कमी आती है तथा खरपतवार एवं कीटों के नियंत्रण में भी सहायता मिलती है। इसके परिणामस्वरूप रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है, जिससे फसल उत्पादन लागत कम होती है और दीर्घकालिक रूप से मृदा की स्थिरता एवं उर्वरता को बढ़ावा मिलता है। जिला प्रशासन ने जिले के किसानों से अपील की है कि जिन क्षेत्रों में सुनिश्चित सिंचाई सुविधा उपलब्ध है, वहां धान की रोपाई से 45 से 60 दिन पूर्व हरी खाद की फसलें जैसे सनई एवं ढैंचा का बुआई हेतु उचित कार्ययोजना तैयार करें। साथ ही किसानों में जागरूकता बढ़ाने, क्षमता निर्माण एवं कृषक प्रशिक्षण के माध्यम से अधिक से अधिक किसानों को इस दिशा में प्रेरित किया जा रहा है।

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