

तबाह हो चुकीं अरावली की पहाड़ियां, चारों ओर धूल और उधड़े पहाड़, पानी भी जहरीला-ऐसे बर्बाद हो रही अरावली
हरियाणा-सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद जिस अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, उसे कितनी बेरहमी से बर्बाद किया जा रहा है, वह जानकर आप हैरान रह जाएंगे।जी एल न्यूज वेबसाइट की टीम 23 दिसंबर 2025 दिन- मंगलवार को हरियाणा के भिवानी जिले के खानक गांव पहुंची। तोशाम विधानसभा सीट का 4 किमी में फैला छोटा सा गांव। एक तरफ से दक्षिण-पश्चिम अरावली पहाड़ियों से घिरा हुआ।यहां कदम रखते ही चारों तरफ धूल ही धूल दिखाई देगी, क्योंकि छोटे से गांव में हर 100 कदम पर 300 क्रशर मशीनें पहाड़ियों को खोद रही हैं। यहां 150 खनन साइट हैं, जहां हर वक्त 500 से ज्यादा डंपर मौजूद रहते हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो आप फिल्म केजीएफ की शूटिंग साइट पर हों। गांव में 1500 घर हैं, जिनमें हरेक की दीवारों में या तो दरारें पड़ चुकी हैं, या उनके प्लास्टर उधड़ चुके हैं। यहां के सरपंच संजय कुमार ग्रोवर ने बताया कि 10 हजार की आबादी में 20 पेट्रोल पंप। किसी गांव में ऐसा देखा है। इस इलाके में खनन का पूरा अधिकार एक ही कंपनी एचएसआईडीसी को मिला है। हालांकि पहले अवैध खनन पर भी सवाल उठते रहे हैं। हमारे घर दरक रहे हैं। ब्लास्ट की आवाजों से बच्चों के दिल-दिमाग पर बुरा असर पड़ रहा है। इन्हें बंद कराने के लिए कलेक्टर, एसपी के यहां धरने दे चुके। ब्लास्टिंग को लेकर चार-पांच मुकदमे दायर कर चुके, लेकिन कोई सुनवाई नहीं। हमारी आंखों के सामने पूरा पहाड़ हरियाली से नंगा कर दिया गया।सामाजिक कार्यकर्ता अशोक मलिक बताते हैं कि अरावली के वही पहाड़ यहां संपूर्ण रूप से बचे हैं, जिनमें भगवान का वास माना गया।
500 फीट गहराई तक खोद चुकीं अवैध खदानें
तोशाम के युवा कल्याण संगठन के अध्यक्ष कमल प्रधान ने बताया कि सिर्फ खानक में कई अवैध खदानें ऐसी हैं जिनमें अरावली को 500 फीट तक गहरा खोद दिया गया है, जबकि आदेश है कि एक भी इंच नहीं खोद सकते। इनमें कुछ खदानें 2022-23 में तब बंद हुईं, जब कुछ मजदूर दबकर मर गए। हरियाणा में अरावली रेंज के दो जिले हैं चरखीदादरी और भिवानी, जिनमें कुल 12 पहाड़ हैं, अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू हुआ तो ये नहीं बचेंगे। खानक, डाडम, धारड़, निगाड़ा, रिवासा समेत दर्जनों गांवों में 1996 से पहले कभी खनन नहीं होता था। पहली बार बंशीलाल सरकार में 4 खनन पट्टों की बोली लगी, तब से यह काम जारी है।उत्तर भारत और थार रेगिस्तान के बीच बैरियर है अरावली
ये खत्म हुआ दिल्ली में हमेशा धुंध रहेगी
अरावली पर्वत श्रृंखला 692 किमी लंबी है, जो गुजरात, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में फैली है। इसके प्रति हेक्टेयर में 20 लाख लीटर भूजल पुनर्भरण की अपार क्षमता है। अपनी ऊंचाई के कारण ही यह धरोहर एक प्राकृतिक डस्ट बैरियर है, जो थार मरुस्थल और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक रुकावट का काम करती है, जिससे मरुस्थलीय रेतीली हवाएं मैदानी इलाकों तक नहीं पहुंच पातीं। यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यहां खनन और वनों की कटाई बढ़ी तो पूरे दिल्ली एनसीआर में पीएम 10 और पीएम 2.5 जैसे प्रदूषक कण बहुत तेजी से बढ़ेंगे। दिल्ली हमेशा स्मॉग में घिरी रहेगी। रेगिस्तान फैलकर हरियाणा, गुजरात, दिल्ली तक आ जाएगा। यही पर्वतमाला दक्षिण-पश्चिम मानसून को रोककर बारिश का पानी जमीन में पहुंचाती है। यदि ये मिटी तो हरियाणा-राजस्थान में अकाल की नौबत आ सकती है। एनसीआर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम खत्म होगा। इसके जंगल न हों तो शहरी इलाके और ज्यादा तपने लगेंगे। यह पर्वतमाला न हो तो तेंदुआ, सियार, भेड़िया जैसे सैकड़ों जीव-जंतु, हजारों वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी। बनास, लूणी, साहिबी जैसी अरावली की नदियां सूख जाएंगी।
अरावली में खनन से पर्यावरण को हो रहा भारी नुकसान
अरावली में क्रशर (खनन) से भारी नुकसान हो रहा है, जिससे प्रदूषण, जल संकट और वन्यजीवों का पलायन हो रहा है, क्योंकि पहाड़ टूट रहे हैं और भूजल रिचार्ज रुक रहा है, जिससे दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत में वायु और जल की समस्या गंभीर हो रही है, और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद अवैध खनन और कटाई जारी है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है.
खनन से होने वाले प्रमुख नुकसान
01- वायु प्रदूषण- क्रशर और खनन से उड़ने वाली धूल से हवा की गुणवत्ता खराब हो रही है, जिससे दिल्ली-NCR में स्मॉग और प्रदूषण बढ़ रहा है.
02-जल संकट- अरावली पहाड़ वर्षा जल को रोककर भूजल को रिचार्ज करते हैं; पहाड़ों के टूटने से यह प्रक्रिया रुक गई है, जिससे कुएँ सूख रहे हैं और जल संकट गहरा रहा है.
03- वन्यजीवों पर असर- विस्फोटों और जंगल कटाई से हिरण, नीलगाय, मोर जैसे जीव-जंतु पलायन कर रहे हैं और उनकी संख्या घट रही है.
04. भूस्खलन और बाढ़- पहाड़ कमजोर होने से भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है और नदियों के रास्ते बदल रहे हैं, जिससे बाढ़ आ सकती है.
05-जलवायु परिवर्तन- अरावली एक प्राकृतिक अवरोधक है जो थार रेगिस्तान को फैलने से रोकता है; इसके टूटने से उत्तर भारत की जलवायु पर बुरा असर पड़ रहा है
06. ग्रामीणों को परेशानी- भयंकर विस्फोटों से घरों और पानी की टंकियों में दरारें आ रही हैं और हमेशा अनहोनी का डर बना रहता है.
अवैध खनन और कानूनी पहलू
पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली का लगभग 35% हिस्सा पिछले दो दशकों में नष्ट हो चुका है,सुप्रीम कोर्ट ने खनन पर रोक लगाई है और सतत खनन योजना बनाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन अवैध खनन जारी है,सरकार का कहना है कि खनन पर नियंत्रण है और नई लीज नहीं दी जाएंगी, लेकिन मुख्य समस्या अवैध खनन है जिसे रोकने के लिए ड्रोन जैसी तकनीक की जरूरत है.
निष्कर्ष- अरावली में क्रशर और खनन के कारण पर्यावरण, जल संसाधनों और वन्यजीवों को भारी क्षति हो रही है, जिससे पूरे उत्तर भारत पर गंभीर संकट मंडरा रहा है, और इसे बचाने के लिए सख्त निगरानी और कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता है



