लोगों को चीटियां कहने वाले भी बन जाते हैं जज. उच्च न्यायालय के जस्टिस भुइयां ने कोलेजियम सिस्टम पर उठाए सवाल

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लोगों को चीटियां कहने वाले भी बन जाते हैं जज. उच्च न्यायालय के जस्टिस भुइयां ने कोलेजियम सिस्टम पर उठाए सवाल

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -जजों की नियुक्ति के लिए कारण नहीं बताने पर कोलेजियम की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां ने शनिवार को कहा कि इससे उन न्यायाधीशों के लिए जगह बनती है, जो किसी समूह के लोगों को ‘चींटियां’ बताने जैसी असंवैधानिक टिप्पणियां करते हैं। कारण नहीं बताने से उन जजों का नुकसान होता है, जो सचमुच बेहतरीन हैं और जिन्होंने बहुत अच्छा काम किया है।मैंने देखा है कि कोलेजियम के पिछले तीन प्रस्तावों में जजों की पदोन्नति का कोई कारण नहीं बताया गया है। क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटना है? कानूनी थिंक-टैंक ‘विधि’ की एक रिपोर्ट को जारी करने के मौके पर आयोजित परिचर्चा में जस्टिस भुइयां ने इस बात पर जोर दिया कि पदोन्नति के लिए कारण नहीं बताने से अयोग्य उम्मीदवार न्यायपालिका में आ सकते हैं।कारण नहीं बताकर संस्थान असल में उन कई न्यायधीशों का नुकसान करता है, जो सचमुच बेहतरीन हैं और जिन्होंने बहुत अच्छा काम किया है।

*इसके उलट कारण नहीं बताने से हम न्यायपालिका में ऐसे लोगों के आने का रास्ता बनाते हैं, जो बाद में लोगों के समूहों को ‘चींटियां’ कह सकते हैं और ऐसी टिप्पणियां कर सकते हैं, जो पूरी तरह से असंवैधानिक और संविधान के मूल्यों के खिलाफ हों। ऐसे लोगों का प्रवेश रोकने के लिए कुछ चर्चा होनी चाहिए। कुछ कारण बताया जाना चाहिए।जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल ही में एक हाई कोर्ट के जज ने ऐसी टिप्पणी की थी। उन्होंने हालांकि किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक तत्कालीन न्यायाधीश ने 2024 में विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में अपनी टिप्पणी से हंगामा खड़ा कर दिया था। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने उनके कथित नफरती भाषण के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने कहा, अपने देश में हमें सिखाया जाता है कि छोटे-से-छोटे जीव को भी नुकसान न पहुंचाएं। चींटियों को भी न मारें और यह बात हमारे मन में गहराई से बैठ जाती है। शायद इसीलिए हम सहनशील और दयालु होते हैं। जब दूसरे दुख में होते हैं, तो हमें भी दर्द महसूस होता है। लेकिन, आपकी संस्कृति में बच्चों को कम उम्र से ही जानवरों को मारे जाने का दृश्य दिखाया जाता है। ऐसे में आप उनसे सहनशील और दयालु होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?कोलेजियम व्यवस्था की आलोचना का जिक्र करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने पहले कहा था कि जब कोलेजियम सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करता है, तो कई बातों को ध्यान में रखा जाता है। जैसे कि उनका कामकाज, जज के तौर पर काम करने की अवधि, पहले संभाले गए पद और यहां तक कि उनका पेशेवर जीवन भी।

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर सुनवाई के दौरान भी जजों की नियुक्ति का मुद्दा उठा था।सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था-जब कार्यपालिका किसी दूसरे शाखा के चयन में शामिल होना चाहती है, तो यह उस शाखा की आजादी का सवाल बन जाता है। क्या न्यायपालिका से यह कहा जा सकता है कि हम आपकी नियुक्तियों पर भरोसा नहीं करेंगे, क्योंकि इसमें कोई बाहरी व्यक्ति शामिल नहीं है?इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा- जैसा कि आपने कहा कि जज ही जजों को चुनते हैं, तो हमें हैरानी होती है। क्या आजकल सच में न्यायाधीश ही न्यायाधीशों को चुनते हैं? मेहता ने कहा कि कार्यपालिका और विधायिका ही ऐसी शाखाएं हैं, जो सीधे जनता के प्रति जवाबदेह हैं

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