मौसम वैज्ञानिकों ने बढ़ाई चिंताएं-मानसून पर एल नीनो का बढ़ा खतरा- सितंबर तक आई ओ डी पॉजिटिव नहीं हुआ तो बढ़ सकता है सुखे का खतरा

मौसम वैज्ञानिकों ने बढ़ाई चिंताएं-मानसून पर एल नीनो का बढ़ा खतरा- सितंबर तक आई ओ डी पॉजिटिव नहीं हुआ तो बढ़ सकता है सुखे का खतरा kshititech

मानसून पर एल नीनो का बढ़ा खतरा- सितंबर तक आई ओ डी पॉजिटिव नहीं हुआ तो बढ़ सकता है सुखे का खतरा

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -मानसून के दूसरे चरण पर सबसे बड़ा दबाव एल-नीनो का होने जा रहा है। इस लिहाज से अगस्त-सितंबर को निर्णायक महीना माना जा रहा है। प्रशांत महासागर में एल-नीनो लगातार मजबूत हो रहा है, जिससे भारत के कई हिस्सों में सूखे की आशंका बढ़ गई है।मौसम विज्ञानियों की निगाह अब हिंद महासागर में विकसित होने वाले इंडियन ओशन डायपोल (आईओडी) पर टिकी है, जो अभी न्यूट्रल है, लेकिन सितंबर में यह पॉजिटिव हो सकता है। ऐसा हुआ तो यह एल-नीनो की चपेट में आए मानसून को नई ताकत मिल सकती है। मौसम विभाग (आईएमडी) के मानसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम (एमएमसीएफएस) के अनुसार, आने वाले दिनों में एल-नीनो अधिक मजबूत हो सकता है, जो मानसून को कमजोर कर सकता है। इससे हवाओं की ताकत घटती है और कई हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रह जाती है। फिर भी मौसम विज्ञानियों को राहत की उम्मीद है।

हिंद महासागर में अभी आईओडी न्यूट्रल है। सितंबर में इसके पॉजिटिव होने का संकेत है। आईओडी के पॉजिटिव होने पर हिंद महासागर से भारत की ओर अधिक नमी पहुंचती है, जिससे मानसून को अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है और एल-नीनो का नकारात्मक प्रभाव काफी हद तक कम हो सकता है।हालांकि भारत का मानसून केवल एल-नीनो से तय नहीं होता। बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र, मानसूनी ट्रफ की स्थिति और हिंद महासागर की परिस्थितियां भी वर्षा की मात्रा एवं वितरण को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि कई बार मजबूत एल-नीनो के दौरान भी देश के कुछ हिस्सों में सामान्य या उससे अधिक वर्षा हो जाती है। लेकिन यदि सितंबर तक आईओडी पॉजिटिव नहीं हुआ तो एल-नीनो का दबाव और बढ़ सकता है, जिससे मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम रहने का खतरा रहेगा।इस बार मानसूनी बारिश में उतार-चढ़ाव भी इसी असमानता को दिखाता है। जून में देश में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम वर्षा हुई थी, जिससे सूखे की चिंता बढ़ गई थी।जुलाई के पहले सप्ताह में अच्छी बारिश से स्थिति कुछ संभली, लेकिन उसके बाद मानसून ब्रेक जैसी स्थिति बन गई। जुलाई के अंतिम सप्ताह में मानसून दोबारा सक्रिय हुआ और खासकर मध्य भारत में सामान्य से 41 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। इसी का असर रहा कि 31 जुलाई तक पूरे देश में बारिश की कमी घटकर 13 प्रतिशत रह गई। फिर भी वर्षा संतुलित नहीं है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में अब भी सामान्य से 30 प्रतिशत कम बारिश हुई है। उत्तर-पश्चिम भारत में 12 प्रतिशत और दक्षिण भारत में 23 प्रतिशत वर्षा की कमी बनी हुई है। इसके विपरीत मध्य भारत में सामान्य से चार प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई है। यानी देश के एक हिस्से में भारी बारिश हो रही है तो दूसरे हिस्से पर्याप्त वर्षा का इंतजार कर रहे हैं

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