आसान नहीं है दीदी की राह-खुलकर सामने आई बगावत -15 विधायक नहीं पहुंचे टीएमसी प्रमुख ममता के निवास पर आयोजित बैठक में. सत्ता से देदखल होते ही विधायकों का भी होने लगा पार्टी से मोह भंग. जहांगीर खान को पार्टी से निकालने की उठी मांग

आसान नहीं है दीदी की राह-खुलकर सामने आई बगावत -15 विधायक नहीं पहुंचे टीएमसी प्रमुख ममता के निवास पर आयोजित बैठक में. सत्ता से देदखल होते ही विधायकों का भी होने लगा पार्टी से मोह भंग. जहांगीर खान को पार्टी से निकालने की उठी मांग kshititech
बंगाल की टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी

आसान नहीं है दीदी की राह-खुलकर सामने आई बगावत -15 विधायक नहीं पहुंचे टीएमसी प्रमुख ममता के निवास पर आयोजित बैठक में. सत्ता से देदखल होते ही विधायकों का भी होने लगा पार्टी से मोह भंग

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -बंगाल की सत्ता से हटते ही तृणमूल कांग्रेस के भीतर का अंदरूनी लावा अब खुलकर सतह पर आने लगा है। तृणमूल सुप्रीमो व पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास ‘कालीघाट’ में हुई विधायक दल की बैठक महज एक औपचारिक समीक्षा बैठक नहीं रही, बल्कि इसने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ पनप रहे गहरे असंतोष को उजागर कर दिया है।इस बैठक की सबसे बड़ी सुगबुगाहट 15 विधायकों की रहस्यमयी अनुपस्थिति और तीन कद्दावर नेताओं व विधायकों द्वारा सीधे राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर उठाए गए सवाल रहे। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी ने पहले ही सख्त हिदायत दी थी कि किसी भी शिकायत को केवल लिखित रूप में दिया जाए। इसके बावजूद बेलेघाटा के विधायक कुणाल घोष, उलुबेरिया पूर्व के ऋतब्रत बनर्जी और एंटाली के विधायक संदीपन साहा ने एक ही गाड़ी में बैठकर कालीघाट पहुंचकर बगावत की नई स्क्रिप्ट लिख दी। इन विधायकों ने फलता से तृणमूल उम्मीदवार जहांगीर खान के ऐन चुनाव से दो दिन पहले मैदान छोड़ने को हथियार बनाया।

जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का बेहद करीबी माना जाता है, इसलिए विधायकों ने सीधे सवाल दागा कि पार्टी विरोधी आचरण के बाद भी उन्हें सस्पेंड क्यों नहीं किया गया? ऋतब्रत और संदीपन ने जहांगीर को ‘केंद्र शासित प्रदेश का नेता’ बताते हुए तंज कसा कि इतनी सहूलियतें मिलने के बाद भी वे रणछोड़ क्यों बन गए?इस विद्रोह की धार तब और तेज हो गई जब कुणाल घोष ने दो टूक कहा कि पार्टी के भीतर ‘खुली हवा’ यानी अभिव्यक्ति की आजादी होनी चाहिए। बंद कमरों में ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स करने के बजाय अब नेताओं को सड़कों पर उतरना होगा। बैठक में अभिषेक की चुनावी घोषणाओं और उनकी हालिया रहस्यमयी चुप्पी पर भी सवाल उठे।वहीं दूसरी ओर, 15 विधायकों का बैठक से नदारद रहना पार्टी के लिए सबसे बड़ा रेड सिग्नल है। हालांकि सात विधायकों ने बीमारी का बहाना बनाया, लेकिन मालदा के हरिश्चंद्रपुर के विधायक का इस अहम वक्त पर दिल्ली में होना और कांग्रेस आलाकमान से संपर्क की खबरें तृणमूल की चिंता बढ़ाने के लिए काफी हैं।साथ ही, शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता का दर्जा दिलाने के प्रस्ताव वाले पत्र पर महज 65 विधायकों के हस्ताक्षर होना साफ दिखाता है कि दीदी के कुनबे में अब सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है

प्रातिक्रिया दे