कोलकाता की प्रसिद्ध दुर्गा एवं काली पूजा की झलक दिखी शक्ति के दुर्गा पंडाल में-शक्ति शहर के स्टेशन दुर्गा पंडाल में दिखा सांस्कृतिक एकता का संगम. दुर्गा पूजा एवं काली पूजा उत्सव समिति ने किया था आयोजन. विधि विधान से होता है दुर्गा पूजा का समस्त संस्कार




कोलकाता की प्रसिद्ध दुर्गा एवं काली पूजा की झलक दिखी शक्ति के दुर्गा पंडाल में-शक्ति शहर के स्टेशन दुर्गा पंडाल में दिखा सांस्कृतिक एकता का संगम. दुर्गा पूजा एवं काली पूजा उत्सव समिति ने किया था आयोजन
शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर
शक्ति६श्री श्री दुर्गा पूजा एवं काली पूजा उत्सव समिति (रेलवे स्टेशन) तथा बंगबंधु बांग्ला समाज समिति, शक्ति के संयुक्त तत्वावधान में 21 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी का पर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास, भावुकता और भव्यता के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बंगाली संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, माँ दुर्गा के प्रति अटूट आस्था तथा सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम देखने को मिला।बंगाली संस्कृति में माँ दुर्गा को परिवार की पुत्री के रूप में माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माँ दुर्गा अपने मायके में कुछ दिन बिताने के पश्चात विजयादशमी के दिन विदा होकर अपने धाम लौटती हैं। इसी भावपूर्ण परंपरा के अनुरूप समाज की महिलाओं ने पारंपरिक बंगाली रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हुए माँ दुर्गा के मस्तक, मुख एवं चरणों में सिंदूर अर्पित किया तथा उन्हें मिष्ठान खिलाकर भावभीनी विदाई दी। माँ की विदाई के क्षणों में अनेक महिलाएँ भावविभोर हो उठीं। वातावरण में भक्ति, प्रेम और विरह की भावनाएँ स्पष्ट रूप से अनुभूत हुईं। सभी ने अगले वर्ष माँ दुर्गा के पुनः आगमन की मंगल कामना करते हुए उनसे सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण का आशीर्वाद माँगा।सिंदूर खेला बना सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रतीकमाँ दुर्गा की विदाई के पश्चात पारंपरिक सिंदूर खेला का आयोजन किया गया, जिसमें बंगाली समाज की महिलाओं के साथ-साथ अन्य समाजों की महिलाओं ने भी उत्साहपूर्वक सहभागिता निभाई। महिलाओं ने एक-दूसरे के गालों पर सिंदूर लगाकर, मिष्ठान खिलाकर तथा शुभकामनाएँ देकर आपसी प्रेम, सौहार्द और मंगलकामना का संदेश दिया। लाल पाड़ की पारंपरिक साड़ियों में सजी महिलाओं की उपस्थिति और सिंदूर की लालिमा ने पूरे आयोजन को विशेष सांस्कृतिक आभा प्रदान की।
बंगाली संस्कृति की यह अनुपम परंपरा वर्तमान समय में केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विभिन्न समाजों और समुदायों के बीच भी लोकप्रियता अर्जित कर रही है। माँ दुर्गा के प्रति जन-जन की अटूट श्रद्धा, उनके चरणों में समर्पण, मिष्ठान अर्पित कर विदाई देने की भावपूर्ण परंपरा तथा लाल पाड़ की साड़ी पहनकर सिंदूर खेला में सहभागिता करने की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति ने अनेक समुदायों को आकर्षित किया है। आज विभिन्न समाजों के लोग भी इस परंपरा से जुड़कर अपनी आस्था और सम्मान प्रकट कर रहे हैं।यह परंपरा भारतीय संस्कृति के उस शाश्वत संदेश को साकार करती है कि “अनेकता में एकता ही भारतीय संस्कृति की विशेषता है।” विभिन्न समुदायों की परंपराओं को आत्मीयता के साथ अपनाना, उनका सम्मान करना और उनसे जुड़ना हमारी सांस्कृतिक उदारता का परिचायक है। सिंदूर खेला के माध्यम से होने वाला यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान सामाजिक सौहार्द, परस्पर सम्मान और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने वाला एक उत्कृष्ट उदाहरण है।ढाक अर्थात पारंपरिक बंगाली ढोल की गूंजती थाप ने पूरे वातावरण को भक्तिमय और उल्लासपूर्ण बना दिया। ढाक की लय पर महिलाओं ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर विसर्जन कार्यक्रम को और भी गरिमामय बना दिया। उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व इसी उत्सव के अंतर्गत बंगाली संस्कृति की अभिन्न पहचान माने जाने वाले आकर्षक धुनुची नृत्य (धूप नृत्य) की भी मनमोहक प्रस्तुति दी गई थी, जिसने श्रद्धालुओं और उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित लोगों ने एक-दूसरे को बंगाली परंपरा के अनुरूप ‘शुभो विजया’ कहकर विजयादशमी की शुभकामनाएँ दीं। मिष्ठान खिलाकर और आपसी स्नेह के साथ सिंदूर लगाकर सभी ने प्रेम, सद्भाव, भाईचारे तथा सामाजिक एकता का संदेश दिया। इस आयोजन ने न केवल बंगाली समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखा, बल्कि विभिन्न समाजों के मध्य आत्मीय संबंधों को भी और प्रगाढ़ किया।इस गरिमामय आयोजन में बंगाली एवं अन्य सहयोगी समाज के सदस्यों, मार्गदर्शकों तथा मोहल्ले के गणमान्य नागरिकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कार्यक्रम के मार्गदर्शक श्री विनय सिन्हा, श्रीमती नीता सिन्हा, श्री रंजन सिन्हा, श्रीमती रीना सिन्हा, श्रीमती अरुणा भट्टाचार्य, पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी श्री बी. एल. खरे, श्रीमती जया भट्टाचार्य, अदिति देवाशीष बनर्जी, मल्लिका साक्षी गोपाल कविराज, मोनालिसा गौतम भौमिक, सोपोन भौमिक, सुब्रा भौमिक, धनलक्ष्मी अमन भौमिक, अभिषेक, अभिज्ञान, रिया सौम्या, रुचि, अमित भौमिक, मंजू, पल्लव भट्टाचार्य, कांचू भट्टाचार्य, सपन विश्वास, प्रीतम मुखर्जी, मनोज सरकार, अजीत दास एवं टोटना सहित भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
समूचा आयोजन भक्ति, परंपरा, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक एकता की अविस्मरणीय अनुभूति के साथ संपन्न हुआ। माँ दुर्गा को भावभीनी विदाई देते हुए सभी ने अगले वर्ष पुनः उनके आगमन की प्रतीक्षा और मंगल कामना के साथ विजयादशमी पर्व कि मूल भावना को जिंदा रखा





