फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में 05 माह बाद भी कार्रवाई नहीं, विभाग की भूमिका पर उठे सवाल; स्टे हटाने में सुस्ती। मामला छत्तीसगढ़ में पीएमजीएसवाई के प्रभारी प्रमुख अभियंता के के कटारे का

फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में 05 माह बाद भी कार्रवाई नहीं, विभाग की भूमिका पर उठे सवाल; स्टे हटाने में सुस्ती। मामला छत्तीसगढ़ में पीएमजीएसवाई के प्रभारी प्रमुख अभियंता के के कटारे का kshititech

फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में 05 माह बाद भी कार्रवाई नहीं, विभाग की भूमिका पर उठे सवाल; स्टे हटाने में सुस्ती। मामला छत्तीसगढ़ में पीएमजीएसवाई के प्रभारी प्रमुख अभियंता के के कटारे का

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -छत्तीसगढ़ के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में फर्जी जाति प्रमाण पत्र से जुड़े एक मामले में कार्रवाई की धीमी रफ्तार अब सवालों के घेरे में है। उच्च स्तरीय छानबीन समिति द्वारा प्रभारी मुख्य अभियंता के के कटारे का जाति प्रमाण पत्र अवैध घोषित किए जाने के करीब पांच माह बाद भी विभाग हाईकोर्ट से मिले स्टे को हटाने के लिए प्रभावी पैरवी नहीं कर पाया है। इस बीच मामले में विभाग की ओर से नियुक्त ओआईसी मुख्य अभियंता रामसागर के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) आवेदन की तीन माह की निर्धारित अवधि भी पूरी होने की सूत्रों से जानकारी मिली है। ऐसे में विभाग की कार्यवाही और उसकी मंशा को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने 26 फरवरी 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए के के कटारे के जाति प्रमाण पत्र को अवैध घोषित किया था। इसके बाद कटारे ने हाईकोर्ट का रुख किया और छानबीन समिति के निर्णय के खिलाफ अंतरिम राहत हासिल कर ली। इसके बाद उम्मीद थी कि संबंधित विभाग न्यायालय में प्रभावी पक्ष रखते हुए स्टे हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा, लेकिन करीब पांच माह गुजरने के बाद भी इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं होने की बात सामने आ रही है।पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब छानबीन समिति पहले ही जाति प्रमाण पत्र को अवैध घोषित कर चुकी है, तो विभाग की ओर से हाईकोर्ट में स्टे हटाने के लिए अब तक क्या ठोस कार्रवाई की गई? विभाग की ओर से इस मामले में प्रभावी कानूनी पक्ष रखने और न्यायालय के समक्ष संबंधित दस्तावेज व तथ्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।विभागीय स्तर पर यह चर्चा है कि यदि सरकार और संबंधित विभाग मामले को गंभीरता से लेते तो स्टे के खिलाफ प्रभावी पैरवी के साथ आगे की न्यायिक प्रक्रिया तेज की जा सकती थी। हालांकि, विभाग की ओर से जानबूझकर कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया गया या किसी अधिकारी को बचाने के लिए कार्रवाई धीमी की गई, इस तरह के दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन चर्चाओं को फिलहाल आरोप और अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।यही वजह है कि अब पूरे मामले को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली पर चर्चा शुरू हो गई है। सवाल यह भी है कि जब एक उच्च स्तरीय समिति का फैसला सामने आ चुका है और उसके खिलाफ न्यायालय से अंतरिम राहत मिली है, तो विभाग को अपने प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर आगे की कार्रवाई में कितनी तत्परता दिखानी चाहिए थी।

अधिकारी के प्रभाव को लेकर भी चर्चाएं

विभागीय गलियारों में के:के कटारे के प्रभाव और लंबे प्रशासनिक कार्यकाल को लेकर भी चर्चाएं हैं। कुछ सूत्रों की ओर से दावा किया जा रहा है कि उनके प्रभाव के कारण अब तक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। हालांकि, किसी राजनैतिक संरक्षण या सत्ता के दबाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन दावों को तथ्य के रूप में नहीं बल्कि आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जाति प्रमाण पत्र की वैधता से जुड़ा विवाद केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहता। यदि किसी सरकारी अधिकारी का प्रमाण पत्र सक्षम समिति द्वारा अवैध घोषित किया जाता है और मामला न्यायालय में लंबित है, तो विभाग की जिम्मेदारी होती है कि वह न्यायिक प्रक्रिया में अपना पक्ष मजबूती से रखे और न्यायालय के अंतिम निर्णय के अनुरूप आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करे।

क्या VRS और जाति मामले का कोई संबंध है?

रामसागर के VRS आवेदन को लेकर भी विभाग में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोगों का दावा है कि उनके VRS आवेदन के पीछे भी इस पूरे प्रकरण से जुड़ी परिस्थितियां हो सकती हैं। हालांकि, VRS आवेदन के वास्तविक कारण की कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, इसलिए इसे जाति प्रमाण पत्र मामले से जोड़ना फिलहाल अनुमान ही माना जाएगा.फिलहाल मामला हाईकोर्ट के स्टे के कारण न्यायिक प्रक्रिया में है। इसलिए जाति प्रमाण पत्र को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति न्यायालय के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी। वहीं विभाग के लिए चुनौती यह है कि वह न्यायालय में प्रभावी पैरवी के साथ अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से निभाए।

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