अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता डॉ राम विजय शर्मा ने लांजीगढ़ किला पर किया विस्तृत शोध. देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े प्रमुख विषयों पर शोध करते हैं डॉक्टर शर्मा. डॉ राम विजय शर्मा के शोध के विषयों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है चर्चा



अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता डॉ राम विजय शर्मा ने लांजीगढ़ किला पर किया विस्तृत शोध. देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े प्रमुख विषयों पर शोध करते हैं डॉक्टर शर्मा
शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर
शक्ति -डॉ राम विजय शर्मा, इतिहासकार, पुरातत्ववेता एवं
अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता ने लांजीगढ़ का किला पर एक दिवसीय शोध कैंप का आयोजन कर लांजीगढ़ के किला पर विस्तृत तथा वैज्ञानिक शोध किया। लांजीगढ़ का किला रायपुर-नागपुर रेल मार्ग पर आमगांव रेल्वे स्टेशन से 25 कि.मी. की दूरी पर स्थित है, जो बालाघाट जिले में है। इस किले का निर्माण आदिवासी गोड राजा कटेसूर मालूकोमा टेकाम ने करवाया था। जो राजकुमारी हसला के दादा थे, लांजीगढ़ किला शुरू से आदिवासी राजा के अधीन रहा। लेकिन नाममात्र की अधीनता रतनपुर की कल्चुरी राजाओं को स्वीकार करते थे। किले पर गोड वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, इसका निर्माण लगभग 12वी शताब्दी में हुआ। किले के अंदर मिली प्रस्तर प्रतिमाओ पर आदिवासी गोड कला का प्रभाव है, जो बिल्कुल सरल होता है। किले के चारो ओर चौड़ी-चौड़ी खाई है जो तालाब के रूप मे है। तथा खाई जैसा नही दिखता बल्कि विशाल तालाब के रूप में जिसमें कमल के फूल खिले है। किले के अंदर मंदिर के अवशेष पर खजुराहो शैली का प्रभाव है। किला का मुख्य प्रवेश द्वार पूरब दिशा की ओर है, जिसमें कछुआ और नाग के विशेष चिन्ह बने हुए है। जो उस समय की सुरक्षात्मक और धार्मिक मान्यताओं के प्रतीक है। खाई में मगरमच्छ पाले जाते थे ताकि दुश्मन किले में आसानी से प्रवेश न कर सके। किले का पतन मराठा आक्रमण के कारण और बाद में अग्रेजो के आक्रमण के कारण हुआ। लेकिन उसकी नींव आज भी उतनी ही मजबूत है। एवं गोड़ राजाओ की कहानी बता रहा है। यह किला 7.5 एकड़ में फैला हुआ है तथा चारो ओर 20 फीट ऊँची दिवार है।
अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता डॉ रामविजय शर्मा ने बताया कि इस किले से राजकुमारी हसला और आदिवासी गोड रानी तिलका बाई का नाम वीरता और शहादत से जुड़ा है। जब 1223 इसवीं में बाहरी दुश्मनो ने किले पर आक्रमण किया था तब गोड राजकुमारी हसला आत्मसमर्पण नही की बल्कि लड़ते-लड़ते युध्द मे शहीद हो गई। उसके सम्मा, कुवारी देवालय का निर्माण किया गया, जिसमें आज भी गाँव के लोग बडे पैमाने पर एजा पाठ करते है और सम्मान देते है। शानीग गोटी गीनो में राजकुमारी हसला आर आदिवासी गाड राना तिलका बाई का नाम वीरता और शहादत से जुड़ा है। जब 1223 इसवीं में बाहरी दुश्मनो ने किले पर आक्रमण किया था तब गोड राजकुमारी हसला आत्मसमर्पण नही राजकुमारी हसला को बड़े आदर से लंजकाई (यानि लांजी की पवित्र कन्या) कह कर पुकारते है। इसी तरह आदिवासी गोड़ रानी तिलका बाई 1818 इसवीं में अंग्रेजो से लड़ते हुए शहीद हुई थी। शोध के दौरान डॉ राम विजय शर्मा को एक बलुआ पत्थर की बनी प्रतिमा मिली जिसे डॉ शर्मा ने आदिवासी गोड़ रानी तिलका बाई का नाम दिया जो खुले रूप में अपने शिशु को स्तनपान करा रही है जो आदिवासी कला का प्रमाण है तथा मां की ममता छलक रही है, एक रानी होते हुए भी खुले तौर पर अपने शिशु का स्तनपान कराते हुए प्रतिमा देश में दुर्लभ है। प्रतिमा के सिर पर राजछत्र शोभित है तथा पैर के पास दास-दासी सेवारत है। इसी तरह, किला परिसर में ही नटराज शिव की प्रतिमा भी मिली जो बलुआ पत्थर से बना है तथा जिसमें आदिवासी कला की सादगी है। शोध कैंप में आचार्य विरेन्द्र सिंह गहरवार राष्ट्रीय अध्यक्ष इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान बालाघाट, राजेन्द्र ब्रम्हे सेवानिवृत्त अधिकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नागपुर, दिनेश नेमा समाजसेवी, तथा ग्रामिण लोग उपस्थित रह कर शोध कैंप को सफल बनाए






