डॉ रामविजय शर्मा ने डोंगरगढ़ की विश्व सुंदरी नर्तकी कामकंदला पर किया शोध. राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं डॉक्टर शर्मा. गौरवशाली इतिहास है डॉक्टर राम विजय शर्मा के शोध विषय का

डॉ रामविजय शर्मा ने डोंगरगढ़ की विश्व सुंदरी नर्तकी कामकंदला पर किया शोध. राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं डॉक्टर शर्मा. गौरवशाली इतिहास है डॉक्टर राम विजय शर्मा के शोध विषय का kshititech

डॉ रामविजय शर्मा ने डोंगरगढ़ की विश्व सुंदरी नर्तकी कामकंदला पर किया शोध. राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं डॉक्टर शर्मा

शक्ति छत्तीसगढ़ से कन्हैया गोयल की खबर

शक्ति -डॉ राम विजय शर्मा इतिहासकार, पुरातत्ववेता एवं अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता रायपुर भारत में एक शोध कैंप का आयोजन कर डोंगरगढ़ की विश्व सुंदरी नर्तकी कामकंदला पर विस्तृत ऐतिहासिक शोध किया प्राचीन काल मे डोंगरगढ़ को कामावती नगरी के नाम से जाना जाता था। राजा वीरसेन ने डोंगरगढ़ रियासत को बसाया था। उनकी कोई संतान नही थी इसलिए उन्होने शिव पार्वती की उपासना की जिसके फलस्वरूप मदन सेन पुत्र की प्राप्ति हुई । मदन सेन के पुत्र राजा कामसेन थे और उन्होने ही इस नगरी का नाम अपने नाम पर कामावती नगरी रखा था। राजा कामसेन के दरबार में विश्व सुंदरी नर्तकी कामकंदला नृत्य करती थी। उसके नृत्य संगीत को देखने के लिए देश-विदेश से राजा महाराजा आते थे। उस समय नृत्य संगीत का समाज में बहुत अधिक महत्व था क्योकि नृत्य संगीत केवल मनोंरंजन के साधन नही थें बल्कि इसके माध्यम से संस्कृति, इतिहास, एवं पौराणिक गाथाओं की प्रस्तुती की जाती थी कामकंदला के संरक्षक के रूप में राजा कामसेन थें, उसी दरबार में संगीतज्ञ माधवानल अपनी संगीत की धारा बहाते थें, उसी बिच माधवानल का कामकंदला से प्रेम हुआ। एक बार दरबार में कामकंदला और माधवानल का संगीत कार्यक्रम चल रहा था। देश विदेश के राजा महाराजा संगीत का आनंद ले रहें थे, राजा कामसेन माधवानल के संगीत से खुश होकर एक किमती हीरे का हार माधवानल को पुरस्कार में दिया बाद में यह हार माधवानल नें कामकंदला को दे दिया। राजा कामसेन इससे नाराज हो गये और माधवानल को देश से बाहर निकाल दिया। इधर-उधर भटकते हुए माधवानल उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुंचें और सारी घटना बताई और न्याय की गुहार लगाई । राजा विक्रमादित्य कामकंदला और माधवानल की प्रेम की परीक्षा लेना उचित समझा और उसके बाद मदद करने की बात बताई

मााधवानल की झूठी मृत्यु की समाचार फैला दी गई यह खबर डोंगरगढ़ में भी पहुंची और मृत्यु की खबर पाकर कामकंदला आत्महत्या कर ली। डोंगरगढ़ में निरासा फैल गई। कामकंदला की मृत्यु का समाचार पाकर माधवानल डोंगरगढ़ आया और उसने भी मृत्यु को गले लगाया। जब राजा विक्रमादित्य को दोनो की मृत्यु का समाचार मिला तो वे बहुत दुखी हुए उन्होने कामावती नगरी पर चढाई की और कामावती नगरी को नष्ट कर दिया। राजा विक्रमादित्य अपना प्राण त्यागने के लिए निश्चय किया । राजा की भक्ती से प्रसन्न होकर देवी बमलेश्वरी प्रकट हुई और माता बमलेश्वरी ने कामकंदला और माधवानल को पुर्नजिवित कर दिया। इसके पश्चात कामावती नगरी का नाम डोंगरगढ़ पड गया। राजा विक्रमादित्य उज्जैन लौट गए और कामकंदला तथा माधवानल पुन डोंगरगढ़ में नृत्य और संगीत की गंगा जमुना की धारा बहाने लगे। डोंगरगढ़ में खुशी की लहर दौड़ गई और बरसो बाद डोंगरगढ़ समृध्द हुआ। आज भी डोंगरगढ़ पहाडी के पास थोडा हटकर कामकंदला के नाम पर कामकंदला सरोवर है। जिसमे राजा रानी और कामकंदला स्नान करती थी। राजा के घोडें भी जल पिते थें, आज भी कामकंदला सरोवर के जल का पवित्र माना जाता है तथा उसे डोगरगढ़ में धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा है। पहाड़ी पर दुसरी ओर तपसी काल नामक स्थान है जहां कामकंदला निवास करती थी।इस शोध कैंप में पटवारी मोहन कोडोपी, संजीव यादव, रमेश यादव, दिपक सिंह, गजेंन्द्र वर्मा, पकलु एवं अन्य ग्गग्रमिण उपस्थित होकर शोध कैंप को सफल बनाया

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